राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ :
उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग-द्वारा गत २४ अक्तूबर को आयोजित ‘सम्मिलित राज्य-प्रवर अधीनस्थ सेवा, सहायक वनसंरक्षक, क्षेत्रीय वन-अधिकारी २०२१’ परीक्षा की ‘सामान्य हिन्दी/हिन्दी-भाषा’ से सम्बन्धित प्रश्नों और उनके उत्तर-विकल्प को लेकर भाषाविज्ञानी और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने स्पष्ट शब्दों में आयोग-द्वारा विद्यार्थियों के भविष्य के साथ किये जा रहे खिलवाड़ को अत्यन्त चिन्ताजनक बताया है। उन्होंने बताया कि प्रश्नपत्र-सेट ‘सी’ के अन्तर्गत प्रश्न १२ में ‘बी’ और ‘सी’ विकल्प शुद्ध युग्म हैं, जबकि आयोग की ओर से ‘बी’ को शुद्ध बताया गया है। नियमत: किसी एक विकल्प को ही शुद्ध होना चाहिए। ऐसे में, या तो बारहवें प्रश्न को हटाना होगा या फिर सभी परीक्षार्थियों को उस प्रश्न में पूरा अंक देना होगा। उल्लेखनीय है कि विकल्प ‘बी’ में दिया हुआ ‘आमदनी’ शब्द ‘फ़ारसी’ का ही है और विकल्प ‘सी’ में दिया गया ‘अँग्रेज़’ शब्द ‘फ्रेंच’ का ही। प्रश्न १६ के सभी विकल्प ग़लत हैं, जबकि आयोग ने ‘डी’ विकल्प को सही माना है। इससे ज़ाहिर होता है कि प्रश्न तैयार करनेवाले को ‘ग्रन्थ’ का अर्थ नहीं मालूम। किसी भी प्रकार की भारी-भरकम पुस्तक को ग्रन्थ नहीं माना जा सकता; ग्रन्थ कहलाने के लिए उसका एक पैमाना है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जो ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ लिखा था, वही एक ‘ग्रन्थ’ है, शेष पुस्तक हैं। ग्रन्थ के अन्तर्गत ‘ऐतिहासिक’ और ‘धार्मिक’ कृतियाँ आती हैं, जबकि प्रश्न में ‘अनेक ग्रन्थों’ का प्रयोग किया गया है। इतना ही नहीं, आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने इस प्रश्नपत्र को तैयार करनेवाले व्यक्ति पर गम्भीर आरोप लगाते हुए कहा है, ” प्रश्नपत्र में विद्यार्थियों की विरामचिह्नों और शुद्ध वर्तनी से सम्बन्धित परीक्षा की गयी है; परन्तु इस प्रश्नपत्र को बनानेवाले व्यक्ति को ही विरामचिह्न और शुद्ध वर्तनी का बोध नहीं है।” उन्होंने बताया है कि प्रश्नसंख्या १, ३, ४, ५, ६, ८, ९, १०, ११, १२, १३, १५, १६, १७, १९ तथा २२ में प्रश्न करने के लिए जहाँ ‘सकारात्मक वाक्य’ प्रयुक्त किये गये हैं, उन सभी के आगे ‘विवरण-चिह्न’ लगेंगे, जबकि वाक्य के आगे कुछ भी नहीं दिख रहा। इस दृष्टि से ये सभी प्रश्न अशुद्ध हैं।
आचार्य पं० पाण्डेय ने बताया है कि प्रश्नसंख्या ५ से ९ के अन्तर्गत एक गद्यांश दिया गया है, जिसमें दो स्थलों पर ‘पूर्ण विरामचिह्न (।) के ठीक आगे ‘किन्तु’ और एक स्थल पर ‘पर’ का प्रयोग किया गया है, जो कि अशुद्ध है। ज्ञातव्य है कि पूर्ण विरामचिह्न के आगे उस वाक्य को जोड़नेवाला शब्द पूर्ण विरामचिह्न के प्रयोग से पूर्व ही आता है। इसी अवतरण में “आत्मसंयम का मार्ग है” वाले वाक्य में अल्प विरामचिह्न (,) के स्थान पर अर्द्ध विरामचिह्न (;) का व्यवहार होगा। ‘याद’ के साथ ‘रखना’ के स्थान पर ‘याद करना’ होगा। अन्तिम वाक्य में ‘खारे पानी जैसा’ की जगह ‘खारे पानी-जैसा’ होगा, जो कि सम्बन्धसूचक वाक्य है। पाँचवें प्रश्न के ‘ए’ विकल्प में ‘अपनी आत्मा’ के स्थान पर ‘अपने आत्मा’ होगा; क्योंकि ‘आत्मा’ पुंल्लिंग-शब्द है।
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का कहना है, “हमारे परीक्षार्थियों से इस प्रश्नपत्र में प्रश्न १८ के अन्तर्गत ‘योजकचिह्न’ (-) से सम्बन्धित प्रश्न किया गया है, जबकि इस प्रश्नपत्र को तैयार करनेवाले को योजकचिह्न का ही बोध नहीं है। यही कारण है कि इस प्रश्नपत्र में योजकचिह्न की उपेक्षा की गयी है।” उन्होंने बताया है कि प्रश्न ७ के विकल्प ‘डी’ में ‘असीमित लालसाओं’ के स्थान पर ‘असीमित लालसा’ होगा। प्रश्न ८ के विकल्प ‘ए’ का वाक्यविन्यास अशुद्ध है, वहाँ ‘सुख दे सकते हैं और आनन्द भी।’ होगा तथा प्रश्न ९ के विकल्प ‘डी’ में ‘मानवीय दु:ख’ होगा।
समय-समय पर आयोग की ओर से आयोजित परीक्षाओं के सामान्य हिन्दी के प्रश्नपत्रों में प्राश्निकों की ओर से की जा रही लापरवाही और प्रकट किये जा रहे उनके अज्ञान के प्रति चिन्ता व्यक्त करते हुए, आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने आयोग के अध्यक्ष और सम्बन्धित अन्य उच्चाधिकारियों से उक्त प्रकार के कृत्य करनेवाले व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर काररवाई करने की माँग की है।