“भरा हो पेट तो संसार जगमगाता है…!
लगी हो भूख तो “योग” कहाँ सुहाता है…!!”
उपरोक्त गीत की इन लाइनों से काफी कुछ समझ में आ गया होगा।
वास्तव में जिस देश की 93% गरीब जनता आज भी कुराजनैतिक धूर्तता के कारण बेरोजगारी/अल्परोजगारी, गरीबी, भुखमरी, अन्याय, भ्रष्टाचार, अत्याचार, हिंसा, गुंडागर्दी, बलात्कार की शिकार हो उसे भला “योग” की क्या जरुरत…?
इसलिए
योगदिवस नहीं, दुनिया को #न्यायदिवस की जरूरत है…!
क्या सचमुच इस देश की 80 करोड़ उस जनता को जो वर्षों से 5 किलो राशन पर जिन्दा रहने पर मजबूर है उसे योग की जरुरत है? विचारणीय!
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“भूखों मरते नागरिकों, व हिंसा की आग में जल रहे मणिपुर वासियों की सूखी व जली हुई हड्डियों में “योगा” से स्वास्थ्य व जीवन ढूंढा जा रहा है धूर्त परजीवी कुराजनेता लोगों द्वारा”
हद ही हो गयी अब तो….
1◆आज देश का 95% जनजीवन अशिक्षा/कुशिक्षा/अल्पशिक्षा की वजह से अपना सामाजिक जीवन स्तर जंगली जीवन से ऊपर नही उठा सका भला उसे योग से क्या लाभ?
2◆आज देश में प्रत्येक 10 में से 9 नागरिक बेरोजगारी या अल्परोजगारी की वजह से बदतर जीवन जीने पर मजबूर हैं उन्हें भला योग से क्या लेना-देना?
3◆आज देश की 86% बस्तियाँ/गाँव/मोहल्ले सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सड़क, पीने का साफ़ पानी, बिजली, परिवहन, संचार, इंटरनेट, पार्क, स्कूल, अस्पताल, स्थाई बाजार न होने की वजह से नारकीय जीवन जीने को मजबूर है भला उन बस्ती वालों को “योग” से क्या लाभ?
4◆आज देश के 83% समुदाय/वर्गों के लोग बीमा, बैंकिंग स्वास्थ्य व सुरक्षा व पेंशन जैसी जीवनोपयोगी सुविधाजनक सुरक्षा के आभाव में भयभीत जीवन गुजारने को विवश है भला उन्हें इस “योग दिवस” से क्या फायदा?
वास्तव में यह योगदिवस तो दुनिया के उन चंद लोगों के लिए ही है जिनके पेट 99% लोगों के “”जनहिताधिकारों”” को हड़प करके भरे हुए हैं, क्योंकि “योग” की जरुरत भरे हुए पेट वालों को ही होती है, भला खाली पेट वालों को “योग” की जरुरत ही क्या है?
जिन कामचोरों ने कभी कोई मेहनत ही नही की सिर्फ हरामखोरी का खाया हो उनके लिए ही “योग” की ज्यादा जरुरत है।
दिनभर मेहनत मजदूरी करने वाले का तो वैसे भी “योगा” हो जाता है।
उपरोक्त बातों से यह सिद्ध हो जाता है की “योग” सिर्फ ऊपर के 1% धूर्त हरामखोर लोगों के लिए है फिर ये पूरी दुनिया के लिए “योगदिवस” कैसे हितकर हुवा?
हम आप देश की सरकारों को सत्ता में इसलिए चुनकर भेजते हैं ताकि ये हम-आप जनता के जनहिताधिकारों (शिक्षा, नौकरी/रोजगार, सार्वजनिक सेवा-सुविधा, सुरक्षा) पर काम करें लेकिन ये क्या ये तो 1% धूर्त लोगों व अपने 4% मानसिक गुलामों के लिए “योगदिवस” की नौटंकी करने में समय और धन व्यर्थ नष्ट करने में लगे हैं।
देश और दुनिया “योग दिवस” मनाने को व्याकुल है।
सैकड़ो करोड़ रूपये फूकने को तत्पर है सभी नेतागण और बाबागण।
हे नेताओं/बाबाओं,
जनता का पैसा जनता के जनहिताधिकारों पर खर्च करो।
देश और दुनिया में न्यायशील नियम नीति निर्णयों पर आधारित व्यवस्था स्थापित कराओ।
सब प्रकार के दुखों से छुटकारा पाओ।
अब वक़्त आ गया है
जागरूक होने का,
जागो जनता जागो।
“योगदिवस” हटाओ।
“न्यायदिवस” मनाओ…!
(राम गुप्ता, स्वतंत्र पत्रकार, नोएडा)