■ हिन्दी के मानकीकरण के लिए विद्वज्जन को सामने आना होगा
बौद्धिक-वैचारिक संस्था ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान में हिन्दी-दिवस की पूर्व-सन्ध्या पर ‘हिन्दी के मानकीकरण की समस्या’ पर एक आन्तर्जालिक अन्तरराष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन अलोपीबाग़ में किया गया, जिसमें देश-देशान्तर के वक्ता-वक्त्रियों ने इस ‘मानकीकरण’ को अनिवार्य बताया।

(कुलपति– सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका, झारखण्ड)
सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका, झारखण्ड की कुलपति प्रो० सोना झरिया मींस का कहना था, “बहुधा यह सुनने को मिलता है कि यह हिन्दी हमारी समझ में नहीं आती। ऐसी हिन्दी से तो अँगरेज़ी ही ठीक है। कभी हिन्दी के क्लिष्ट और कृत्रिम होने की शिकायत की जाती है तो कभी इसकी सरलता को हास्यप्रद माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विषमता शब्दप्रयोग में एकरूपता का न होना है, इसलिए इसका मानकीकरण अपरिहार्य बन जाता है।”

(विद्वान और विचारक, जबलपुर, म० प्र०)
विद्वान् और विचारक प्रो० रहसबिहारी द्विवेदी (जबलपुर) ने कहा, “हिन्दी विश्वव्यापिनी है और वैज्ञानिक भाषा भी है। इसकी मौखिक और लिखित भाषाओं में प्रयोगस्तर पर समानता की आवश्यकता है। कम-से-कम हिन्दी में लिखित पाठ्यपुस्तकों तथा केन्द्रीय और प्रादेशिक शासन के कार्य-व्यवहार में मानकीकरण लागू होना चाहिए।”

(मेडिकल-छात्रा, निकेरी प्रान्त, सूरीनाम)
निकेरी प्रान्त, सूरीनाम की अंकिता जैन मेडिकल की छात्रा हैं। उनका मानना है, “मैं बहुत अच्छी हिन्दी बोल लेती हूँ; परन्तु जब एक ही अर्थ के लिए कई तरह के ग़लत शब्दों का प्रयोग देखती हूँ तब मानकीकरण की ज़रूरत महसूस करने लगती हूँ, फिर वही बात याद आने लगती है, बिल्ली के गले में घण्टी बाँधने को जायेगा कौन?”

(विधानसभाध्यक्ष, झारखण्ड)
झारखण्ड-विधानसभाध्यक्ष रबीन्द्र नाथ महतो ने बताया, “हम हिन्दी में मात्राओं का अलग- अलग रूप में प्रयोग कर रहे हैं, जो कि प्राय: ग़लत होते हैं। इसका मुख्य कारण मानकीकरण न होने के कारण कोई रोक-टोक भी नहीं है, जो कोई अच्छा संकेत नहीं है।”

भाषाविद् और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
परिसंवाद-आयोजक भाषाविद् और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का मत है, “मानकीकरण के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा सरकारी ‘तकनीकी शब्दावली आयोग’ है, जिसने बिना शब्द-स्वभाव को समझे-परखे देश के करोड़ों रुपये बरबाद कर दिये और अब भी वह बरबादी जारी है। सच तो यह है कि उस आयोग में शब्दप्रयोग- निर्धारण करने के लिए ‘विद्वान्’ और ‘विशेषज्ञ’ के रूप में बुलाया जाता है, उन्हें ही नहीं मालूम रहता कि किस शब्द के अर्थ के लिए कौन-सा शब्द उपयुक्त है, इसीलिए आज ‘डाइरेक्टरिट’ के लिए कहीं ‘संचालनालय’, कहीं ‘निदेशालय’ तो कहीं ‘संचालक-मण्डल’ का प्रयोग किया जाता है। मानकीकरण करते समय बलप्रयोग उचित नहीं होगा, बल्कि सहज और सुगम मार्ग पर चलना होगा। यही कारण है कि हिन्दी के मानकीकरण के मार्ग में आज एक नहीं, हज़ारों बधाएँ हैं। सरकार इस दिशा में किंकर्त्तव्यविमूढ़ है।”

(सहायक प्राध्यापक– संस्कृतविभाग, मुँगेर विश्वविद्यालय, बिहार)
मुंगेर विश्वविद्यालय, बिहार में संस्कृत-विभाग में सहायक प्राध्यापक डॉ० कृपाशंकर पाण्डेय की मान्यता है, “हिन्दी भाषा में अनेक ऐसे शब्द हैं जिन्हें अशुद्ध लिखने की परम्परा-सी चल पड़ी है। स्वयं को विद्वान् समझनेवाले लोग भी ‘तत्त्व’, ‘महत्त्व’, ‘व्यावहारिक’, प्रामाणिक, अन्तरराष्ट्रीय आदिक शब्दों को अनेक बार अशुद्ध लिखते हैं और उन पर कोई प्रश्न भी नहीं उठाता है। यह समस्या केवल शुद्ध लिखने तक सीमित नहीं है, अपितु शुद्ध उच्चारण की भी है। श, ष, स, क्ष, त्र, ज्ञ आदिक वर्णों के उच्चारण में हिन्दीभाषा-भाषी प्रायः त्रुटि करते हैं, जो कि अत्यन्त क्षुब्ध करने वाली स्थिति है। केन्द्र और राज्यसरकारों ने हिन्दी भाषा के संरक्षण और विकासार्थ अनेक संस्थाओं के गठन किये; परन्तु उनकी स्थिति ”ढाक के तीन पात”-जैसी रही।”

शासकीय परास्नातक महाविद्यालय, गढ़कोटा, सागर (म०प्र०) में हिन्दीविभाग में अध्यक्ष और समीक्षक डॉ० घनश्याम भारती ने कहा,”वर्तमान में हिन्दी के मानकीकरण की समस्या अपना भयावह रूप लेती जा रही है। आज हम हिन्दी के कई अमानक शब्द लिख, पढ़ तथा बोल रहे हैं। हिन्दी की कई पुस्तकों के मुखपृष्ठ पर ही लोग अमानक हिन्दी के शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। हाल ही में दिल्ली से एक पुस्तक ‘प्रतिरुप मां’ शीर्षक से प्रकाशित हुई है, जबकि ये दोनों शब्द अमानक और भ्रामक हैं, साथ ही अशुद्ध भी। ‘प्रतिरूप माँ’ ये शब्द मानक हैं। विद्वज्जन से विशेष आग्रह है कि हिन्दी के मानकीकरण की समस्या का निराकरण करने का प्रयास करें। यदि हम सब मिलकर हिन्दी के मानकीकरण का प्रयास करेंगे तो वह दिन दूर नहीं, जब हिन्दी अपने पूर्ण मानक स्वरूप को प्राप्त होगी।”

(साहित्यकार, प्रयागराज)
साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी, प्रयागराज के विचारानुसार, “मानक भाषा की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता; क्योंकि सभी बोलियों में प्रशासनिक, साहित्य-रचना, अध्ययन-अध्यापन तथा सामान्य संवाद में कठिन और अव्यावहारिक है। इतना सब कुछ जानते हुए भी कुछ लोग मानकीकरण को नकार देते हैं। मानकीकरण के बिना भाषा पथभ्रमित हो, संवादहीनता और भ्रम की स्थिति पैदा करती है। हिन्दी के मानकीकरण से उच्चारण, वर्तनी, शब्द- सम्पदा, व्याकरण तथा लिपि की शुद्धता और एकरूपता की कोई अनदेखी नहीं कर सकता है।”

(साहित्यकार और राजनेत्री, ग़ाज़ीपुर, उ० प्र०)
साहित्यकार और राजनेत्री डॉ० संगीता बलवन्त, ग़ाज़ीपुर ने कहा, “शब्दों की शुद्धता और समानता के लिए भाषा का मानकीकरण परम आवश्यक है। इस-हेतु राष्ट्रीय स्तर पर एक कार्यशाला की व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें देशभर के शिक्षाविद् और भाषाविद् को एक मंच पर आकर मानकीकरण के लिए व्यावहारिक संवाद करना होगा। राष्ट्रहित और भाषाहित में मानकीकरण आवश्यक है। सरकार को भी इसमें रुचि लेनी चाहिए, तभी भाषा की उन्नति होगी।”

इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषाविभाग में सहायक प्राध्यापक प्रो० शिवप्रसाद शुक्ल ने कहा,” सत्ता के मोह में धर्म और भाषा बदलना भारतीयों के फित्रत में है। लिपि के विकास का पुरोधा देश आज ‘फॉण्ट’ में उलझकर रह गया है। प्रादेशिक लोकसेवा आयोगों की भाषानीति अलग है। इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए हिन्दी के मानकीकरण के प्रयासरत रहना होगा।”

(अध्यापक और साहित्यकार, गोंडा, उ० प्र०)
अध्यापक और विचारक घनश्याम अवस्थी, गोंडा, उ० प्र० ने कहा, “हमारी राजभाषा ‘हिन्दी’ अनेक बोलियों से घिरी हुई है। प्रायः बोलियों के प्रभाव के चलते लोग हिन्दीभाषा के अशुद्ध लेखन की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। एक बार मानकीकरण कर देने से भाषा समृद्ध नहीं हो जाती। भाषा को प्रवहमान और एकरूप बनाये रखने के लिए समय-समय पर मानकीकरण की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए देश के वैयाकरण और भाषाविद् मानकीकरण-प्रक्रिया में शामिल किये जायें। अशुद्ध और भ्रामक शब्द-प्रयोग पर विचार करके सर्वसम्मत शुद्ध शब्द सुनिश्चित किये जायें, तभी हमारी राजभाषा के संवर्द्धन का कार्य सफल हो सकेगा।”

सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका (झारखण्ड) के हिन्दी-विभाग में सहायक प्राध्यापक डॉ० अजय शुक्ल ने कहा, “मानकीकरण अब अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं होता है तो शब्दप्रयोग में अराजकता आ सकती है। सम्पूर्ण राष्ट्र में एक भाषा और शब्दप्रयोग पर विचार करना होगा।”

(प्रतियोगी विद्यार्थी, हरदोई, उ० प्र०)
प्रतियोगी विद्यार्थी आदित्य त्रिपाठी, हरदोई का मत है, “हिन्दी के व्याकरण और शब्दावली का मानकीकरण किया जा चुका है। यह आम भारतीय की भाषा है। अरबी-फ़ारसी और संस्कृत इसकी आधारभाषाएँ हैं। ध्यान देनेवाली बात है कि हिन्दी में संस्कृत, फ़ारसी तथा अरबी की अपेक्षा संस्कृत के तद्भव शब्द अत्यधिक हैं। हिन्दी में देश की मौलिक भाषा के समस्त गुण समाहित हैं, फिर भी हिन्दी को वह स्थान प्राप्त नहीं हुआ है, जो होना चाहिए था। ऐसे में राजकीय स्तर पर उस भाषा का मानकीकरण अपरिहार्य हो जाता है, जिससे कि देश का सर्वसाधारण उस भाषा को आसानी से समझ सके।”

ओबिकारो युनिवर्सिटी ऑव़ एग्रीकल्चर ऐण्ड वेटरनरी मेडिसिन, जापान में लैब सहायिका अरुणा आत्रे ने बताया, “साइंस और मेडिकल के लिए ऐसा कोई कोश नहीं है, जिसकी मदद से हम हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए सोच सकें। अपने देश में इन मामलों में हिन्दी को बढ़ावा नहीं दिया गया। इसके लिए सरकारी नीतियाँ दोषी हैं। मैं तो देखती हूँ, हिन्दी-शब्द-प्रयोग में एक-जैसी बात है ही नहीं।”
अन्त में, आयोजक ने सहभागियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की।