डॉ. निर्मल पाण्डेय (इतिहासकार/लेेेखक) :

राष्ट्रवादी विचारक, प्रख्यात मनीषी, सुपरिचित इतिहासकार, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के संस्थापक सदस्यों में से एक प्रो. सतीश चंद्र मित्तल (1938 -2019) राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से इतिहासलेखन के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे। प्रो. मित्तल कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में आधुनिक भारतीय इतिहास के वरिष्ठ प्रोफेसर, संस्कृति मंत्रालय के केंद्रीय सलाहकार मंडल के सदस्य और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली) के सदस्य एवं गुरुकुल फेलो रहे।
प्रो. मित्तल ने तीन दर्जन से अधिक पुस्तकों का लेखन किया साथ ही विभिन्न विख्यात पत्र-पत्रिकाओं में उनके लगभग 500 लेख प्रकाशित हुए हैं। अंग्रेजी भाषा में लिखी उनकी कुछ महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं—फ्रीडम मूवमेंट इन पंजाब (1905-1929); सोर्सेज ऑन नेशनल मूवमेंट इन इंडिया (1919-1920); हरियाणा : ए हिस्टॉरिकल पर्सपैक्टिव (1761-1966); ए सिलेक्टेड अनोटेटेड बिब्लियोग्राफी ऑन फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया : पंजाब एंड हरियाणा (1858-1947), मॉडर्न इंडिया व इंडिया डिस्टॉर्टेड : ए स्टडी ऑफ ब्रिटिश हिस्टॉरियंस ऑन इंडिया (तीन भाग में)।
हिंदी में प्रकाशित उनकी कृतियों में प्रमुख हैं:—भारत में राष्ट्रीयता का स्वरूप (प्रारंभ से मुस्लिम काल तक); भारत का स्वाधीनता संग्राम, ब्रिटिश इतिहासकार तथा भारत, 1857 की महान् क्रांति का विश्व पर प्रभाव; स्वामी विवेकानंद की इतिहास दृष्टि, साम्यवाद का सच, भारतीय नारी : अतीत से वर्तमान तक, विश्व में साम्यवादी साम्राज्यवाद का उत्थान एवं पतन, मुस्लिम शासन और भारतीय जनसमाज; भारत के राष्ट्र चिंतकों का वैचारिक दर्शन तथा इतिहास दृष्टि, 1857 का स्वातंत्र्य समर एक पुनरावलोकन (यह पुस्तक हिंदी, कन्नड़ और गुजराती तीन भाषाओं में एक साथ प्रकाशित हुई), आधुनिक भारतीय इतिहास की प्रमुख क्रांतियां, अविस्मरणीय विजयनगर साम्राज्य तथा महाराजा कृष्ण देव राय, 1857: द वनवासी लीडरशिप (अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों में) , 1857 के महासंघर्ष में क्या पंजाब अंग्रेजों के प्रति वफादार रहा?, ब्रिटिश इतिहासकार तथा भारत, भारतीय इतिहास लेखन की विकृतियां: तथ्यों के आईने में, आधुनिक भारत का आर्थिक इतिहास, भारत का संक्षिप्त इतिहास, ऐतिहासिक परीक्षाओं के 67 वर्ष (कुछ मुद्दे 1947 से 2014 तक), 1857 की क्रांति का विश्व पर प्रभाव, कांग्रेस : अंग्रेज भक्ति से राजसत्ता तक एवं हिंदुत्व से प्रेरित विदेशी महिलाएँ।
प्रो. मित्तल उन छह याचिकाकर्ताओं में शामिल थे, जिन्होंने वेंडी डोनिगर की किताब ‘द हिंदू: एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ पर भारतीय इतिहास को लेकर त्रुटिपूर्ण तथ्यों और भ्रामक इतिवृत लेखन पद्धति अपनाने के कारण प्रतिबंध लगाने की मांग की थी।
राष्ट्रवादी इतिहास दृष्टि से लैस इतिहासलेखन को संकल्पबद्ध प्रो. मित्तल सेवाभाव से संकल्पित थे, उन्होंने हरियाणा में विद्याभारती द्वारा संचालित कुछ स्कूलों का प्रबंधन भी किया। उनका अपना शोध पंजाब में स्वतंत्रता आंदोलन पर केंद्रित था। उनके पास इतिहासलेखन की भारतीय दृष्टि थी और वे समकालीनों द्वारा रचे इतिहास दृष्टि के बरक्श एक राष्ट्रवादी आख्यान के निर्माण के लिए रचे जाने वाले इतिहासपथ के लाइट हाउस थे, जो आने वाले समय में भारत के इतिहास लेखन की राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के अनुकूल पथप्रदर्शक का काम करेगी।
प्रो. मित्तल ने जीवन के अंतिम क्षणों में भी भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय अध्यक्ष के दायित्व का निर्वहन किया।
सनद रहे, अखिल भारतीय इतिहास-संकलन योजना, इतिहास के क्षेत्र में कार्यरत विद्वज्जनों का एक राष्ट्रव्यापी संगठन है जो इतिहास, संस्कृति, परम्परा आदि के क्षेत्र में प्रामाणिक, तथ्यपरक तथा सर्वांगपूर्ण इतिहास-लेखन तथा प्रकाशन आदि की दिशा में कार्यरत है।
अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के योजना गीत ‘#कृत्वानवदृढ़संकल्पम्।#वितरन्तोसन्देशम्..’ में वर्णित पथ पर प्रो. मित्तल आख़िर आख़िर तक दृढ़ता से अनवरत चलते रहे। श्री जनार्दन हेगड़े विरचित इस योजनागीत में राष्ट्रवादी दृष्टि से नए सन्देश, नव संघटन, नए इतिहास के रचना-निर्माण-संगठन हेतु कमर कसने का आह्वान किया गया है।
प्रो. मित्तल का ‘व्यक्तित्व, कृतित्व और कर्तृत्व’ योजनागीत की अंतिम पंक्तियों में वर्णितपथ पर चलने को सदा प्रेरणाबद्ध करता रहेगा, जिसमे कहा गया है:..
‘प्रगतिपथान्नहि विचलेम। परम्परां संरक्षेम: समोत्साहिनो निरुद्वेगिनो नित्यनिरन्तरगतिशीलाः।। …
अर्थात् ‘हम अपनी प्रगति के पथ से विचलित नहीं होंगे और हम अपनी परंपरा को बनाए रखेंगे। उत्साह के साथ और बिना किसी चिंता के, हम आगे भी प्रगति करते रहेंगे।’
कल 11 सितम्बर 2020 को प्रो0 सतीश चन्द्र मित्तल जी की प्रथम पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् ने अपने पुस्तकालय-सह-प्रलेखन केंद्र (Library-cum-Documentation Centre) को उनका नाम दिया। यह भारतीय इतिहासलेखन की पाश्चात्य चेतना की आधारभूमि से प्राच्य चैतन्य की ओर, इतिहास की देह को देने सम्पूर्ण आकार देने की दिशा में एक सार्थक एवं स्वागतयोग्य कदम है।
और हाँ, जैसा अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव और पाथेय आदरणीय भाई साब डॉ. Balmukund Pandey ने कहा, ‘ये नाम ही नहीं, बल्कि प्रो. मित्तल जी के व्यक्तित्व, कृतित्व और कर्तृत्व का शिलापट्ट है, जो कम से कम अगले पांच हजार वर्षों तक हमें प्रेरित करता रहेगा।’
अंतिम क्षण तक कर्मरत और महाप्रस्थान से कुछ समय पहले तक सक्रिय रहे राष्ट्रवादी विचारक, प्रख्यात मनीषी, सुपरिचित इतिहासकार, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के संस्थापक सदस्यों में से एक और इतिहास संकलन योजना के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. सतीश चन्द्र मित्तल जी पिछले वर्ष आज ही के दिन महाप्रयाण पर गए, उनका जाना राष्ट्रवादी दृष्टि से भारतीय इतिहासलेखन की धारा के लिए एक अपूरणीय क्षति थी, पर अपने व्यक्तित्व, कृतित्व और कर्तृत्व के साथ इतिहास, इतिहासकारों, इतिहास-पिपासुओं को सदैव भारतीय चैतन्य से लैस करते रहेंगें।
उनकी याद में भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रान्त ने ‘#प्रोसतीशचन्द्रमित्तलस्मृति_व्याख्यानमाला आरम्भ करने का निर्णय लिया है, जिसका पहला लेक्चर प्रो. मक्खन लाल द्वारा ‘इंडियन हिस्टोरिओग्राफ़ी: शेड्स एंड फ़ेजेज’ विषय पर 17 सितम्बर 2020 को होना तय है।
आज प्रो. मित्तल की पुण्यतिथि है, पुण्यतिथि पर ऋषितुल्य कर्मयोगी राष्ट्रवादी इतिहासलेखन के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे प्रो. मित्तल जी के व्यक्तित्व, कृतित्व और कर्तृत्व को सादर नमन, विनम्र श्रद्धांजलि।