प्रश्न-क्या प्रेम में मेल जरूरी है..?
उत्तर- किसी के प्रति स्नेहभाव, मैत्रीभाव, आदरभाव, समर्पणभाव ही प्रेम है।
भावनात्मक मेल ही मैत्री है, प्रेम है।
इच्छाओं, भावनाओं, कामनाओं का मेल ही मैत्री है, प्रेम है।
यह प्रेम वास्तव में परिचय से प्रारम्भ होता है और समर्पण पर पहुँचकर पूर्ण होता है।
परिचय, मैत्री, श्रद्धा, समर्पण ही क्रमशः चार चरण हैं प्रेमसम्बन्धों की यात्रा के लिए।
EQ वाले मनुष्य ही इस प्रेम के मार्ग पर चलते हैं।
भक्ति का उदय ही प्रेम से है।
श्रद्धा ही भक्ति है, आदर ही भक्ति है, पूजा ही भक्ति है, उपासना ही भक्ति है।
किसी के पीछे भागना ही भक्ति है।
फालोवरशिप ही भक्ति है।
किसी में लीन हो जाना, अभिन्न हो जाना, उससे ओतप्रोत हो जाना ही समर्पण है।
समर्पणभाव विकसित हुए बिना वास्तविक प्रेम संभव नहीं। समर्पण में ही प्रेम की पूर्णता है। विलेयता ही समर्पण है। विंदु का सिंधु में विलय ही श्रेष्ठ समर्पण है।
बिंदु का सिंधु में विलय ही उत्कृष्ट समर्पण है।
स्व का सर्व में विलय ही उचित समर्पण है।
प्रेम में समर्पण भावनात्मक होता है इसमें किसी से भौतिक विलय की अनिवार्यता नहीं होती।
क्योंकि भौतिक विलय प्रत्येक व्यक्ति की अपनी परिस्थितियों पर ही निर्भर होता है।
जबकि भावनात्मक समर्पण किसी से भी सम्भव है।
अर्जुन-कृष्ण, भरत-राम तो भौतिक रूप से मिल सकते हैं लेकिन मीरा और कृष्ण के बीच कालभेद के कारण भौतिक नहीं केवल भावनात्मक मेल ही सम्भव था। यह मेल ही श्रद्धा बनकर समर्पण तक जाता है।
मनुष्यों को चाहिए कि वे अपने प्रेम का क्रमबद्ध विकास करें..!
मनुष्य अपने जीवन में किसी न किसी से प्रेरित या इंस्पायर होता है।
यह प्रेरणा या इंस्पिरेशन ही प्रेम है।
बिना प्रेरणा के कोई भी कर्म सम्भव नहीं होता।
लोग प्रेम का अर्थ दूसरे स्वार्थी भावों में करने की प्रवृत्ति वाले हो गए हैं। इसीलिए प्रेम को नष्ट कर डाले और अब सारा जगत घृणा से भरता जा रहा है।
अहंकार, घृणा, भय, आक्रमण, युद्ध और विनाश और दुःख ही जगत् की नियति बन गयी है।
अहंकार ही इस विनाश का मूल है। इस अहंकार का विसर्जन केवल प्रेमभाव में ही सम्भव है।
स्वयं से प्रेरित होना ही अहंकार है।
और अपने प्रिय आदर्श से प्रेरित होना ही प्रेम है।
इसीलिए प्रेम जागे बिना अहंकार समाप्त नहीं होता।
प्रेम का सबसे बड़ा आदर्श होता है सत्य।
यह सत्य ही ईश्वर है ब्रह्म है परमात्मा है।
यह सत्य ही परम उपास्य है। और यह उपासना ही प्रेम है।
सत्य के प्रति जैसे जैसे आस्था बढ़ती है वैसे वैसे मनुष्य के हृदय में प्रेम का विकास होता है।
सच्चाई ईमानदारी ही प्रेम के विकास का मूल है।
बेईमान लोग कभी प्रेमपूर्ण नहीं हो सकते।
राम गुप्ता , स्वतंत्र पत्रकार, नोएडा