‘अग्निपथ’ के काल्पनिक ‘अग्निवीर’ नरेन्द्र मोदी की योजना पर कैसे विश्वास कर लें?

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

देश का प्रमुख व्यक्ति मात्र सत्ता पाने के लिए देशहित मे कोई घोषणा कर दे और शीघ्र ही उसे ‘ज़ुम्ला’ का नाम देकर पीछे हट जाये तो ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व मे यदि किसी भी प्रकार की ‘लोकलुभावनी’ योजना बनायी जाती है और उसे सार्वजनिक की जाती है तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न तो खड़े ही होंगे।

‘न्यू इण्डिया की कथित मोदी-सरकार’ ने न जाने कितने वायदे किये हैं; घोषणाएँ की हैं, जो अभी तक मात्र ‘शाब्दिक’ बनकर रह गयी हैं; जैसे– १- लोकायुक्त का गठन २- किसानों की समस्या-निराकरण ३- नोटबन्दी करके विदेशों से काला धन वापस लाना। ४- महँगाई कम करना ५- स्वास्थ्य-शिक्षा सर्व-सुलभ कराना। ६- जम्मू-कश्मीर की आतंकी समस्या का निराकरण करना ७- चीन-विवाद को सुलझाना आदिक शताधिक योजनाएँ, जो अभी तक ‘कुँआरी’ बनी हुई हैं।

ऐसे मे, ‘अग्निपथ’ का एक नया तमाशा दिखाकर ‘डमरू’ और ‘पिपीहरी’ बजाकर हमारे युवावर्ग को लुभाने की कोशिश ‘नटराज’ के लिए महँगी पड़ चुकी है। ‘अग्निपथ’ योजनान्तर्गत युवाओं का चयन करने के बाद लिखित रूप मे उसके भविष्य को अन्त तक सुरक्षित किये रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। अब सरकार और सैन्य अधिकारियों के बुद्धि-विवेक पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। सेना मे भरती करने के लिए जो प्रशिक्षण के उच्च मानदण्ड होते हैं, वे बने रहेंगे?

मात्र आश्वासन का चारा फेंककर हमारे देश के युवावर्ग को गुमराह किया जा रहा है। उन्हें कभी तथाकथित धर्म और मज़्हब की अफ़ीम चटायी जाती है तो कभी छद्म आकर्षण-डोर से बाँधा जाता है। यही सब देखते-समझते हुए, हमारी युवाशक्ति अपने वय-वार्द्धक्य के साथ अपनी वास्तविक ऊर्जा का क्षरण करती आ रही है और परिणाम मे मात्र ‘छलावा’ दिखता आ रहा है। आश्चर्य है! इतना सब घटित हो जाने के बाद भी; आत्मघाती स्वप्निल लोरियाँ सुनने के बाद भी अधिकतर युवाओं की आँखें बन्द-की-बन्द हैं और ‘मोदी-मोहपाश’ मे जकड़े हुए हैं।
कभी-कभी यह सोचकर घोर आश्चर्य होता है कि नरेन्द्र मोदी स्वयं को आवश्यकता से अधिक चतुर-चालाक और जनता को ज़रूरत से ज़्यादा मूर्ख कैसे समझ लेते हैं? क्या मात्र सत्ता-अधिग्रहण किये रखने के लिए किसी व्यक्ति का इस हद तक पतन हो सकता है, समझ से परे है।

कथित सरकार ने जिस निरंकुशता के साथ विपक्षी दलों, विशेषत: काँग्रेस के अस्तित्व को समाप्त कर, हम देशवासियों पर’अधिनायकतन्त्र’ (तानाशाही) थोपने की विफल कोशिश की है, उससे उसकी मंशा जग-ज़ाहिर हो चुकी है।

अब समय आ चुका है, ‘सत्ता-परिवर्त्तन’ का; परन्तु इसमे विपक्षी दलों की सकारात्मक भूमिका का दिखना अनिवार्य है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ जून, २०२२ ईसवी।)