जीने पर उपेक्षा और मरने पर ‘अपेक्षा’!

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कल्याण सिंह जब स्वस्थ थे तब उनको जो सम्मान मिलने चाहिए थे, मिले ही नहीं। जैसे अटलबिहारी वाजपेयी की उपेक्षा की गयी थी और मृत्यु के बाद कसीदे गढ़े और पढ़े गये थे; अनेक परियोजनाएँ उनके नाम पर कर दी गयी थीं वैसे ही कल्याण सिंह के साथ हो रहा है और होगा भी। शव के सामने रोते हुए, अपना ‘बाप’ बताना; अपना प्रेरणास्रोत कहना और न जाने किन-किन उपाधियों से शाब्दिक आभूषण पहनाना, कथित राजनेताओं की एक सोची-समझी चाल रही है। पिछले दो दिनों से एक राजनैतिक दल के खेमे में जिस प्रकार का शोक पसरा हुआ है, वह स्वयं में एक गम्भीर प्रश्नचिह्न का आकार ले चुका है। कल्याण सिंह जब एक अत्यन्त योग्य और तुलनास्तर पर भी अत्युत्तम मुख्यमन्त्री थे तब उन्हें पुन: मुख्यमन्त्री क्यों नहीं बनाया गया था? इसका उत्तर अब कूटनीतिक गह्वर में डाला जा चुका है।

उनकी महत्त्वाकांक्षा को राज्यपाल-पद की कुर्सी के पायों में बाँध दी गयी थी। चूँकि कल्याण सिंह पिछड़े-वर्ग के थे इसलिए अब पिछड़े वर्गों, विशेषत: कुर्मी, काछी आदिक जातियों के समुदाय को लुभाने के लिए तरह-तरह के उपक्रम किये जायेंगे।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि उत्तरप्रदेशविधानसभा का चुनाव आसन्न है और सत्ता के मदान्ध खिलाड़ी ‘पिछड़े-अति पिछड़े-वर्ग के (लिंगपट्ट) लँगोट धोने के लिए तरह-तरह के साबुन बनवाने के लिए विशेष कारख़ानो को अग्रिम आदेश कर चुके हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ अगस्त, २०२१ ईसवी।)
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