०भाषा-विमर्श० – ‘प्रतीक-योजना’ क्या है?

‘डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’



मानवीय चेतना की विकास-गाथा में प्रतीकों की विशिष्ट भूमिका रही है। संकल्प-विकल्पात्मक मन की यह प्रथा है कि वह विभाजित सत्यों को चित्रित-प्रतीकित करने की कामना करता है। आदिम युग की भाषाविहीन स्थिति में अभिनय और अंग-विक्षेप से भाव-प्रकाशन और विचार-विनिमय हुआ करता था। शनैः-शनैः प्रतीकीकरण की प्रवृत्ति अस्तित्व में आयी और आत्माभिव्यक्ति के उद्देश्य से कालान्तर में भाषा और लिपि का उद्भव हुआ था। पहले प्रभाव-व्यंजना भावात्मक ध्वनियों के द्वारा होती थी और उन संगीतमय ध्वनियों ने ही आगे चलकर, शब्द का विग्रह धारण कर लिया। शब्द एक प्रतीक है, जिसका अर्थ श्रोता के विचार में निहित रहता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ९ जून, २०१८ ई०)