● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
जो भी जन ‘आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ और ‘आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-द्वारा प्रकाशित’ उन शब्दों का प्रयोग अपने सम्प्रेषण मे करते आ/दिख रहे हैं, जिनका व्यवहार उनके (आचार्य की पाठशाला और आचार्य) द्वारा पहली बार किया जा रहा है अथवा विलुप्त शब्दों को पुन: प्रकट (‘पुनर्प्रकट’ अशुद्ध है।) कर, प्रसारित किया जा रहा है, वे ‘हमारी उपर्युक्त पाठशाला’ और ‘आचार्य’ के नाम का उल्लेख ‘साभार’ के रूप मे अवश्य करें; क्योंकि उन सभी शब्दों और शब्दप्रयोग को ‘मौलिक चिन्तन’, ‘गवेषणा’ तथा ‘स्वाध्याय’ के परिणामस्वरूप अर्जित किया गया है। वे सभी शब्द आचार्य की पाठशाला और उनके (आचार्य के) सम्प्रेषण मे प्रयोग किये जाते रहे हैं।
सहस्राब्दि (‘सहस्राब्दियों’ अशुद्ध है।) से जिन शब्दों और शब्दप्रयोग की अशुद्ध वर्तनी और अनुपयुक्त अर्थ प्रकाशित होते आ रहे थे, उनमे से बड़ी संख्या मे ऐसे प्रचलित शब्द और उनके व्यवहार रहे हैं, जिनका परिमार्जन कर, उक्त पाठशाला और आचार्य के व्यक्तिगत सम्प्रेषण मे उनके प्रांजल रूप और अर्थ प्रस्तुत किये जाते रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि वे सभी शब्द और शब्दप्रयोग शीघ्र प्रकाश्य ‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक अनन्य कृति मे अपनी ‘मौलिकता’ के साथ अपनी ज्ञानरश्मि को विकीर्ण करते हुए लक्षित होंगे। हमारी मौलिकता अव्याहत (युक्तियुक्त) रहे, इसलिए ऐसे जन शब्दार्जन के स्रोत का अनिवार्य रूप से उल्लेख करें। उस कृति मे इस सत्य का उल्लेख रहेगा कि इससे पहले ‘अमुक’ शब्द और शब्दप्रयोग को अन्यत्र व्यवहार मे नहीं लाया गया था और न ही लाया जा रहा है। यही मौलिकधर्मिता ‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक कृति का वैशिष्ट्य है।
ऐसे जन अपने चिन्तन-धरातल का विस्तार कर, रचनात्मक उद्योग करें और अभिनव स्थापना भी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)