डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
प्रातःकाल का समय था। आकाश में हल्की लालिमा फैल रही थी। पूर्व दिशा में सूर्य अभी उगा नहीं था, परन्तु उसका संकेत धरती को जागृत कर चुका था। आश्रम के प्रांगण में तुलसी के समीप दीपक की लौ स्थिर थी—न अधिक काँपती, न पूर्णतः स्थिर—मानो वह भी किसी प्रतीक्षा में हो।
निरंजन उसी दीपक के सामने बैठा था। उसके भीतर पिछले दिनों के संवाद, प्रश्न और अनुभूतियाँ एक साथ घूम रही थीं। उसे लग रहा था कि वह बहुत कुछ जान चुका है, परन्तु जितना जानता है, उतना ही अज्ञात का विस्तार भी बढ़ता जाता है।
आचार्य ने दूर से उसे देखा और बिना कुछ कहे उसके पास आकर बैठ गए। कुछ क्षण दोनों मौन रहे। वह मौन बोझिल नहीं था; वह किसी गहरे संगीत की तरह था, जिसमें शब्दों की आवश्यकता नहीं होती।
थोड़ी देर बाद आचार्य ने कहा— “निरंजन! आज हम कुछ नहीं बोलेंगे।”
निरंजन ने विस्मित होकर उनकी ओर देखा “गुरुदेव! क्या मौन भी शिक्षा का माध्यम हो सकता है?”
आचार्य मुस्कराए— “वाणी ज्ञान का द्वार है, पर मौन ज्ञान का गृह है। शब्द हमें मार्ग दिखाते हैं, पर मौन हमें उस मार्ग पर चलाता है।”
यह सुनकर निरंजन की आँखें झुक गईं। उसे स्मरण आया—वह कितने शब्दों में उत्तर खोजता रहा, कितने तर्कों में सत्य को बाँधने का प्रयास करता रहा, परन्तु जब भी वह शांत होकर बैठता, भीतर एक अलग ही प्रकाश अनुभव होता।
आचार्य ने पुनः कहा “मनुष्य के भीतर दो धाराएँ प्रवाहित होती हैं—एक शब्दों की और दूसरी अनुभूति की। शब्दों की धारा बाहर की ओर बहती है, अनुभूति की धारा भीतर की ओर। जब तक दोनों का संतुलन नहीं होता, तब तक जीवन अधूरा रहता है।”
निरंजन ने धीरे से पूछा— “तो क्या मौन ही सर्वोच्च साधना है?”
आचार्य बोले— “नहीं। केवल मौन भी अज्ञान हो सकता है, यदि वह पलायन का मौन हो। परन्तु जब मौन सजगता से उत्पन्न होता है, तब वह समाधि का द्वार बन जाता है।”
आश्रम के वृक्षों पर बैठी चिड़ियाँ अब चहचहाने लगी थीं। हवा में मन्द गन्ध थी—मिट्टी की, तुलसी की, और किसी अनाम पुष्प की। उस वातावरण में बैठकर निरंजन को लगा कि प्रकृति स्वयं किसी गूढ़ शास्त्र का पाठ कर रही है।
आचार्य ने अपनी आँखें बंद कर लीं। निरंजन ने भी उनका अनुकरण किया। कुछ ही क्षणों में उसे अपने भीतर उठते विचारों का शोर सुनाई देने लगा—बीते हुए प्रसंग, भविष्य की कल्पनाएँ, अपने प्रति और संसार के प्रति अनेक भाव। पहले वह उन विचारों से लड़ता था, पर आज उसने केवल उन्हें देखना प्रारम्भ किया।
धीरे-धीरे विचारों का वेग कम होने लगा। जैसे कोई नदी समुद्र के समीप पहुँचकर शांत हो जाती है।
उसे अनुभव हुआ कि भीतर एक साक्षी है—जो न प्रसन्न होता है, न दुःखी; जो केवल देखता है। वही साक्षी उसकी वास्तविक पहचान है।
उसकी आँखों से अनायास आँसू बह निकले। कुछ समय बाद आचार्य ने पूछा— “क्या देखा?”
निरंजन ने धीमे स्वर में कहा—
“गुरुदेव… मैंने कुछ देखा नहीं… पर एक शांति का अनुभव हुआ… जैसे मैं स्वयं को पहली बार देख रहा हूँ।”
आचार्य ने संतोष से सिर हिलाया—
“यही मौन का आलोक है। जब मन स्वयं को देखता है, तब वह स्वयं से मुक्त होने लगता है।”
फिर उन्होंने एक श्लोक उच्चारित किया—
‘यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥’
(गीता 6.20)
“जहाँ चित्त शांत हो जाता है, और आत्मा स्वयं में ही संतुष्ट हो जाती है—वही योग की अवस्था है।”
निरंजन ने अनुभव किया कि यह श्लोक अब केवल शब्द नहीं रहा; वह उसकी अनुभूति का वर्णन बन गया है।
आचार्य बोले “निरंजन! जीवन में तीन प्रकार के मौन होते हैं। पहला वाणी का मौन है। जब हम बोलना छोड़ देते हैं। दूसरा मन का मौन है जहाँ जब विचार शांत हो जाते हैं। और तीसरा अहंकार का मौन है जब ‘मैं’ का भाव विलीन हो जाता है।
पहला साधन है, दूसरा साधना है, और तीसरा सिद्धि है।”
निरंजन ने पूछा— “क्या अहंकार का मौन संभव है?”
आचार्य ने उत्तर दिया— “जब तुम स्वयं को कर्ता मानना छोड़ दोगे, तब अहंकार मौन हो जाएगा। तब तुम केवल साक्षी रहोगे—और वही मुक्ति का प्रारम्भ है।”
यह सुनकर निरंजन के भीतर एक नया प्रश्न उठा— “यदि सब कुछ ईश्वर ही कर रहा है, तो मनुष्य का प्रयत्न क्या है?”
आचार्य ने कहा— “प्रयत्न यह है कि तुम अपने को ईश्वर के अनुकूल बना लो। जैसे दीपक का कार्य केवल तेल और बाती को तैयार रखना है; प्रकाश स्वयं अग्नि देती है।”
आश्रम में अब सूर्य की किरणें प्रवेश कर चुकी थीं। दीपक की लौ मंद पड़ गई थी, पर उसका प्रकाश व्यर्थ नहीं गया था—वह निरंजन के भीतर उतर चुका था।
निरंजन ने अनुभव किया कि उसके प्रश्न अब उतने तीखे नहीं रहे। उनमें एक शांति आ गई है। पहले वह उत्तर चाहता था; अब वह अनुभव चाहता है।
आचार्य ने उठते हुए कहा— “आज से तुम्हारी साधना का नया चरण प्रारम्भ होता है। प्रतिदिन कुछ समय मौन में बैठो—पर केवल चुप मत रहो, जाग्रत रहो।”
निरंजन ने प्रणाम किया। उसके भीतर अब कोई उत्सुकता नहीं थी, कोई अधीरता नहीं थी—केवल एक स्थिरता थी, जैसे कोई नदी अपने मार्ग को पहचान चुकी हो।
उसने सोचा— “अब तक मैं ज्ञान को शब्दों में खोजता रहा, पर आज अनुभव हुआ कि सत्य शब्दों के परे है। मौन ही उसका सेतु है।”
वह तुलसी के समीप गया, दीपक को हाथ जोड़कर प्रणाम किया, और आकाश की ओर देखा। उसे लगा—जैसे सम्पूर्ण आकाश मौन होकर भी बोल रहा है।
उस क्षण उसे अपने भीतर एक वाक्य स्पष्ट सुनाई दिया— “मौन ही वह स्थान है जहाँ आत्मा और परमात्मा का संवाद होता है।”