सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

देश के संवेदनहीन समाचार-चैनलवालो! डूब मरो

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

देश के समाचार-चैनलवालो! गिर तो पूरी तरह से चुको हो; अब उठ-उठकर; सरक-सरककर कब तक और कितना गिरते रहोगे?

गुजरात के मोरबी पुल के टूटने से सैकड़ों लोग मरे थे। वहाँ पर तो तुम सब गये ही नहीं और गये भी होगे तो वहाँ की रिपोर्ट दिखाये नहीं; उस पर पैनल चलाये भी नहीं; मगर अफ़्सोस! (‘अफ़सोस’ अशुद्ध है।) तुम सब श्रद्धा की हड्डियाँ तलाशने के लिए जंगल-जंगल छानते हुए, स्वयं को दिखा रहे हो; सत्येन्द्र जैन किससे मसलवा रहे हैं; कहाँ मसलवा रहे हैं; क्या खा रहे हैं; क्या नहीं खा रहे हैं, इन्हें उचक-उचककर तुम्हारे यहाँ की महिलाएँ और पुरुष दिखा रहे हैं; ‘बाइस्कोप’ दिखा रहे हैं। आज (२३ नवम्बर) न्यायाधीश ने अपना आदेश प्रसारित कर दिया है :– सत्येन्द्र जैन को जैसा ‘भोजन’ दिया जा रहा है वैसा ही दिया जाये। तो छछून्दरो-छछून्दरियो! अब क्या दिखाओगे-दिखाओगी?

तुम सब मीडिया की आज़ादी के नाम पर कितनी और किस हद तक बेहयायी करते रहोगे?

मोरबी की मच्छु नदी मे वहाँ के सस्पेंशन पुल के टूटने से जितने लोग जिनके कारण मरे थे, उनके कार्यालयों और घरों मे गये थे? यदि गये थे तो प्रश्न-उत्तर के वीडियो कहाँ हैं और यदि नहीं गये तो किसके डर, भय तथा आतंक से नहीं गये थे? यही है, तुम सबका चरित्र? आक् थू!

अब और सुनो, तन-मन से पूरी तरह से बिके हुए मीडियाकर्मियो! यदि वही घटना/दुर्घटना भारतीय जनता पार्टी-रहित किसी भी राज्य मे घटी होती तो तुम सभी चड्ढी और पैण्टी उतारकर १०० मीटर की फर्राटा दौड़ लगाकर सबसे पहले पहुँचने की डुगडुगी पिट रहे होते और लगातार वहाँ से “बाल की खाल” निकाल रहे होते। तुम सबने यदि अपनी-अपनी माँ के स्तन का दूध (पॉवडरवाला दूध नहीं) पिया हो तो तुम सब अपने-अपने माइक्रोफ़ोन को मोदी, योगी, शाह तथा नड्डा के मुख के सामने लगाकर उपर्युक्त पुल-घटना पर प्रश्न करके दिखा दो।

देश के प्रमुख विपक्षी दल ‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ (यहाँ ‘काँग्रेस’ अनुपयुक्त शब्द है।) के शीर्षस्थ नेता राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा को तुम सबने उस गम्भीरता से नहीं लिया है, जिस गम्भीरता से तुम सभी ने नरेन्द्र मोदी की केदारनाथ-यात्रा, वाराणसी-यात्रा, गुजरात-यात्रा आदिक ‘सर्कसी’ ढंग से दिखाया था।

सच तो यह है कि तुम सब जिसकी नौकरी कर रहे हो, (पत्रकारिता और मीडियाकर्मिता नहीं।), उसके एक-एक इशारे पर फूँक-फूँककर क़दम बढ़ा रहे हो, आद्यन्त (‘आद्यान्त’ अशुद्ध है।) सत्य यही है। ऐसे मे, स्वयं को ‘लोकतन्त्र का चतुर्थ स्तम्भ’ कहकर ‘लोकतन्त्र’ के साथ बलप्रयोग (बलात्कार) मत करो।

ख़ुद को ‘मीडिया’ कह रहे बेईमानो! तुम सब चुल्लूभर पानी मे क्यों नहीं डूब मरते? यही स्थिति बनी रही तो देशहित मे विचार-चिन्तन करनेवाले तुम सभी के चैनलों पर थूकना भी पसन्द नहीं करेंगे। क्या ‘मीडिया’ का अर्थ ‘दल्लाली’ है? एकपक्षीय प्रचारण-प्रसारण है?

एक व्यक्ति-विशेष के दल्लालों (‘दलालों’ ग़लत है।) के संकेत और क्रीत-दासत्व का जीवन कब तक जीते रहोगे? आज समझदार समाज के लोग तुम सब के चरित्र-चाल-चेहरा को भली-भाँति समझ चुके हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय: २३ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)