■ देश की जनता संविधान मे बदलाव चाहती है
‘सर्जनपीठ’ की ओर से ‘संविधान-दिवस’ के अवसर पर २६ नवम्बर को अलोपीबाग़, प्रयागराज से एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद ‘संविधान मे परिवर्त्तन की माँग’ विषय पर आयोजित किया गया, जिसमे देश के अनेक बुद्धिजीवियों की सहभागिता रही।
डॉ० रविकुमार मिश्र (सहायक प्राध्यापक– समाजशास्त्र, नागरिक पी० जी० कॉलेज, जंघई, जौनपुर) ने बताया, “भारतीय समाज की संरचना पर्याप्त तीव्र परिवर्त्तन से गुज़र रही है। विकास और विस्थापन, पर्यावरण, प्रवास, स्त्री की अस्मिता, बालश्रम, विविध तरह के दुर्व्यवहार, मूल्यों का विस्फोट, बहुसंस्कृतिवाद, जनसंख्या, रोजगार की परिवर्तित होती अवधारणा, संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति, सरकार के उत्तरदायित्व, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की छवि, सूचना-प्रौद्योगिकी जनित समस्याएँ, उत्तराधिकार और वरिष्ठ नागरिक की सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा के विविध स्तरों पर संकट आदिक ऐसे पहलू हैं, जहाँ स्थापित प्रविधानों की समीक्षा, पुनर्पाठ, समकालीन निर्वचन को ध्यान में करके अपेक्षित संशोधन ज़रूरी है।”
सतीशचन्द्र द्विवेदी (अधिवक्ता– उच्च न्यायालय, इलाहाबाद) का मत है, “हमारे संविधान मे वर्तमान परिवेश और परिस्थितियों को देखते हुए, अनेक ऐसे प्रविधान हैं, जो अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं, जिन्हें समाप्त कर नये चिन्तन और सामाजिक व्यवहार को देखते हुए नये प्रविधान लाने चाहिए।”
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, आयोजक (भाषाविज्ञानी और समीक्षक, प्रयागराज) की अवधारणा है, “हमारे न्यायालय मे एक दुर्दान्त अपराधी को मृत्युदण्ड दिया जाता है; उसी अपराधी को एक अन्य न्यायालय मे आजीवन कारावास की सज़ा सुनायी जाती है, फिर किसी अन्य न्यायालय मे उसे बाइज़्ज़त बरी कर दिया जाता है, इन विसंगतियों से मुक्ति पाने के लिए संविधान मे कोई स्पष्ट प्रविधान नहीं दिखता। इस संदर्भ मे बिल्किस बानो-प्रकरण, चिन्मयानन्द-काण्ड आदिक को समझा जा सकता है। अपराधी व्यक्ति को चुनाव न लड़ने दिये जाने, विधायक, साँसद बनने के लिए शैक्षिक योग्यता और उन्हें दी जा रहीं अनावश्यक सुख-सुविधाओं-साधनो को समाप्त करने के लिए संविधान मे संशोधन अनिवार्य हो जाता है। न्यायालय का स्वतन्त्र अस्तित्व कैसे बना रहे, यहाँ पर संविधान का व्यावहारिक पक्ष मौन दिखता है।”
राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ (स्वतन्त्र पत्रकार, हरदोई) के अनुसार, “संविधान-दिवस पर यह विचार किये जाने की आवश्यकता है कि इस पर होने वाले सत्ता-प्रतिष्ठानो के हमलों को जनता कैसे रोक सकती है? कैसे जनता देश मे बढ़ रही असहिष्णुता को रोक सकती है? संविधान मे वर्णित कर्त्तव्यों के प्रति हमे जागरूक रहना होगा और किसी देवदूत के आने की आशा-त्यागकर, अपने कर्त्तव्यों का पालन करना होगा।”
डॉ० सोनम सिंह (सहायक आचार्य और विभागाध्यक्ष– कानपुर विद्यामन्दिर महिला महाविद्यालय, कानपुर) का विचार है, “अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की परम्परागत परिभाषा में संशोधन होना चाहिए। कई राज्यों मे बहुसंख्यक समुदाय ही अल्पसंख्यक हैं; किन्तु अल्पसंख्यकों को मिलनेवाली सुविधाएँ उन्हें नहीं मिल पातीं। शिक्षा को आरक्षण से दूर रखना चाहिए। शिक्षा का एकमात्र आधार योग्यता हो। आरक्षण व्यवस्था के ही कारण कभी-कभी ९०% वाले अभ्यर्थी भी अयोग्य हो जाते हैं और ३५% वाले अभ्यर्थी का चयन हो जाता है। प्रश्न है– जब वे शिक्षक बनकर जाते हैं तब क्या सिर्फ किसी एक समुदाय को पढ़ाते हैं? स्वाभाविक है कि ९०% और ३५% वाले अभ्यर्थियों की बौद्धिक क्षमता में भिन्नता होगी। शैक्षिक स्तर मे गिरावट का यह भी एक कारण है। योग्य अभ्यर्थी अपना रास्ता कहीं से भी निकाल लेते हैं, यही कारण है कभी-कभी ओबीसी आदि का कटऑफ सामान्य से भी ऊपर चला जाता है। संविधान मे इन विन्दुओं को जोड़ना होगा।”
डॉ० धारवेन्द्रप्रताप त्रिपाठी (हिन्दी-प्रवक्ता– मेरी लुकस स्कूल एवं कॉलेज, प्रयागराज) ने कहा, “आरक्षण-विषय को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है। इसे सुविधा समझा जाये, न कि जन्मजात अधिकार। न्याय की गुंज आम से लेकर ख़ास तक के लिए एक-जैसी हो। इसके लिए और अधिक प्रविधान की आवश्यकता है। आम जनता को उसके अधिकारों की रक्षा के लिए ‘लाल फीताशाही’ के प्रभाव को न्यूनतम करने की आवश्यकता है।”