कोई भी मनुष्य जन्मना ‘विशेष’ नहीं बनता; महान् नहीं बनता। विशेष और महान् बनाती है, उसकी आचरण की सभ्यता और संस्कृति। इसके लिए मनुष्य को आत्मचिन्तन करना पड़ता है। समाज की ‘विकृत’ व्यवस्था के साथ जुड़कर उसे ‘संस्कृत’ करना पड़ता है; ‘विवाद’ के साथ सम्बद्ध होकर उसे ‘संवाद’ के स्तर पर लाना पड़ता है। यही एक सत्यनिष्ठ मनुष्य का गुणधर्म है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ अगस्त, २०२१ ईसवी।)