आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का संदेश

‘मनुष्यता’ की बात तो की जाती है; किन्तु अपने भीतर की शुष्क मानवीय संवेदना पर दृष्टिपात करने में प्राय: मनुष्य क्षम (‘सक्षम’ अशुद्ध है।) नहीं रहता है। यही कारण है कि उसके कथ्य, उपदेश आदिक निर्दिष्ट लक्ष्य का वेधन/बेधन नहीं कर पाते और विषय-वस्तु की गम्भीरता का अवसान हो जाता है; वैचारिक क्रान्ति की उष्मा ठण्ढी पड़ जाती है; ऊर्जा कुन्द हो जाती है तथा कथनकार, उपदेशक आदिक का अन्तर्मन उसे कोसता रहता है। यही कारण है कि विचारजीवियों और बुद्धिजीवियों के शब्द समाज तक पहुँचते-पहुँचते, क्लान्त (थक) हो चुके रहते हैं; क्योंकि ‘शब्दसंधान’ करने के लिए आचरण में शुचिता का होना अनिवार्य है।

तो आइए! आचरण के द्वारा पावित्र्य-भाव जाग्रत् करें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० अप्रैल, २०२२ ईसवी।)