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आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का काव्य-वैभव

एक–
‘राम’-भाव से शून्य हैं, ‘श्री’ से भी हैं हीन।
भाड़े के ‘जय’ दिख रहे, मानो कोई दीन।।
दो–
देश तोड़ना रह गया, जिनके जिम्मा काम।
हृदय हलाहल है भरा, बोलें जय श्री राम।।
तीन–
नारी! तू नारायणी, कवि कहता चहुँ ओर।
अबला-सबला क्या बला, मन-मानस अति थोर।।
चार–
चंचल चपला चारु चर, प्रणय-प्रसंग प्रतीत।
विदित विरूप विडम्बना, नीवर निन्द्य निपीत।।
पाँच–
कण्ठ-कण्ठ से कण्ठ है, चण्ड-चण्ड से चण्ड।
रंग-रंग से रंग है, अंग-अंग से अंग।।
छ:–
राज खा गया नीति को, दिखती नीति धड़ाम।
भीतर-भीतर घात है, ऊपर-ऊपर राम।।
सात–
सोच संकुचित दिख रही,भाषा-भाव मलीन।
सूरत भोली आड़ ले, लगते बहुत प्रवीन।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १० मार्च, २०२१ ईसवी।)

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