बृजेश पाण्डेय ‘बृजकिशोर’ (रीवा, म.प्र. Mo. 9424623018)‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’ – अरस्तू।
मनुष्य समाज में जन्म लेता है, समाज के अन्दर पलता-बढ़ता है। समाज में रहकर उससे बहुत कुछ सीखता है। अब यदि वह समाज से सब कुछ ले रहा है तो उसे दे क्या रहा है? अतः उसकी नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वह कुछ प्रदान भी करे। अपने स्वार्थ, अहं भाव से परे उठ कर परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति सत्कर्म की नैतिक जिम्मेदारी वहन करे।
हमारा राष्ट्र आज विश्व में उन्नत राष्ट्र की श्रेणी में शीर्ष पर स्थापित होने को है। वैज्ञानिक, तकनीकी, आर्थिक आदि क्षेत्रों में जहाँ निरन्तर प्रगतिशील है, वहीं सामाजिक, सांस्कृतिक, वर्ग-वैषम्य, नैतिक मूल्यों में ह्रास होता हुआ दिखाई दे रहा है। बेरोजगारी बढ़ रही है, संघर्ष चरम पर पहुँच रहा है, पल पल में हत्याकांड हो जाते हैं।
ऐसे में हम सबकी अनिवार्य जिम्मेदारी बनती है कि इस तरह की घटनाएँ घटित न होने पाएँ। यह केवल शासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इस राष्ट्र के नागरिक होने के नाते हम सबको प्रयास करना चाहिए। यह तभी सम्भव है जबकि व्यक्ति व्यक्ति में नैतिकता की बलवती भावना हो।
हम स्वयं अच्छी जिन्दगी बसर कर रहे हैं, लेकिन क्या यह सोचा कि मेरा पड़ोसी भाई कैसा जीवन जी रहा है? मनुष्य इस सृष्टि में सबसे बुद्धिजीवी प्राणी है। दुर्भाग्यवश आज वह स्वार्थी हो गया है और आसुरी वृत्तियों का संरक्षक बनता जा रहा है। वह निजता का इतना पक्षधर हो गया है कि समष्टि कहीं बहुत दूर चला गया है।
आज पुनः संगठित, सामूहिक, संयोजित होने की तीव्र आवश्यकता आ पड़ी है। समाज के पिछड़े-कुचले, दलित-आदिवासी, अशक्त, कमजोर (आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर) पीड़ित सभी को साथ ले चलने की क्रियाशीलता होनी चाहिए। हर वर्ग में समानता का विश्वास भरना होगा।
यह मनुष्य प्रकृति का बड़ी तेजी से दोहन कर रहा है, इस दोहन के क्रम में यह विस्मरण कर गया कि भावी पीढ़ी भी इसी प्रकृति के आश्रित है। जल, वायु, मृदा, खनिज संसाधन आदि का धड़ल्ले के साथ उपयोग किया जा रहा है, प्रदूषण में वृद्धि लगातार हो रही है, हमारे रासायनिक संयंत्रों के कारण पर्यावरण विघटित हो रहा है। यदि हम अब भी नहीं सचेत हुए तो भयंकर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
हमें अपनी संस्कृति, परम्परा, धरोहर को संजोकर रखना होगा। इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थापित करने की जरूरत है, जबकि ऐसा करने में हम असफल हो रहे हैं। प्रेम, सौहार्द्र, बन्धुत्व कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने की नैतिक प्रवृत्ति का ह्रास हो रहा है। संगठित रहकर ही राष्ट्र की, समाज की और अपनी सुरक्षा कर सकते हैं, अन्यथा एक एक करके सभी पराजित हो जाएंगे- युद्ध में, विकास में। और फिर परतंत्रता दूर नहीं रहेगी।
नारी प्राचीन काल से प्रतिष्ठित रही है, उसे फिर से प्रतिष्ठित स्वरूप देना है, वह सृष्टि के चक्र की धुरी है। जितना पुरुष का स्थान है उतना ही स्त्री का भी महत्त्व है। उन्हें गार्गी, अपाला, घोषा, मैत्रेयी बनाना होगा। स्त्री शक्ति का स्वरूप हैं बिना शक्ति के कोई भी कार्य सम्भव नहीं है।
अतः संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर सबको साथ लेकर विकासवाद को सार्थक करना है। हम सब नैतिकता से संयुक्त हों और सबको सहयोगी के रूप में स्वीकार करें।