डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के प्रकाशनाधीन भोजपुरी उपन्यास ‘तिरछोल चाची’ का एक अंश

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

“का हो हमार चकचोन्हर चाची! काहाँ उधियाइल बाड़ू। अपना गरदनिया में भागवा गमछा लटकइले आ खइनी फटकत तूँ एतना सुनर-साघर लउकलू कि बुझाए लागेला कि तहरा के भगवान जी बाड़ा सरसन्त से ठोकि-ठाकि के ए जमनिया पर उतरले बाड़े। काँहें से कि तू एतना तिरछोल हऊ कि चाचा के भेज देलू डेरा आ ढुकि जालू छछूनरा भगेलुआ के लेइ के पलानी में। अरे उहे टुअरा के, जवन तहरा के नेताईन बनाइ के परोसत रहल आ तू छैल-छबीलि बनि के अईसन बुझाये लागलू, जइसन कवने इनदरासन के परी ए जमीनिया पर उतर आइल होखे।”
एतने में चरपहिया में बइठि के चकचोन्हर चाची आ जाली। आगे बढ़ि के बाडीगाड लेखा कारवा के फटकिया भगेलुआ खोल देला। आहाहा… ओहोहो….एहेहे… चकचोन्हर चाची उलटी पाला मारि के बानारसी साड़ी में एतना जँचत रहुई कि ए दादा! कुछू मत। नीचे से ऊपर तक अइसन लागत रहली कि बढ़वनो के कुछू-कुछू होखे लागल। तबे त पकड़िया के हेठवा बइठल बुढ़ऊ सरजुआ बुदबुदाये लागल, “अरे दादा! बीस साल पहिले भेटाइल रहतू।” आ एगो लमहर साँस छोड़ि के रहि गईल।
चकचोन्हर चाची के नमवो बदलाई दीहल गईल बा; अब उनकर नवकवा नाम ‘रूपा’ हो गईल बा। एतने ना जवन चकचोन्हर चाची अपना सीधा मँगिया में पावभर सेनूर भरत रहली हा, अब उहे टेढ़ मँगिया कई के, मथवा पर एगो आधा सेनटीमीटर के लमहर लकीर खिंचाईल लउकत रहे। आ कान्हा पर खूबे नीमन परस लटकाई के,
अँखिया में गुलाबी रँग के बाड़का सीसावाला चासमा लगाई के कवनो कटरीना से उनईस ना रहेली हमार चकचोन्हर चाची।
आ होने हमार किसन चाचा फजीरे से निकलि जाले डेरा; आ बेचारू खेत-खरिहान में साँझ ले फँसल रहि जाले। चकचोन्हर चाची के राजनीती के चसका अईसन लागि गईल बा कि बाड़का-बाड़का नेतवा ऊनकरा आगे-पीछे डोलत रहेला। चाची दसि बजे निकलि जाली आ कबो एगारह-बारह बजे रतिया में आवेली आ कबो ओनिए पाँच सीतारा होटलि में माजा मारे ली।


(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ९ जनवरी, २०१८ ई०)