आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय–
एक–
कारवाँ रुके वा बढ़े, फ़िक़्र किस बात की,
मंज़िल है पाँव तले, फ़िक़्र किस बात की?
दो–
रिश्ते अब सभी, ज़ख़्मी-से दिखते हैं,
अपनों से बेहतर, ग़ैर यहाँ दिखते हैं।
तीन–
संगतराशी करते-करते, संगे दिल बन गया तू,
यहाँ की आबो हवा, तुझे चैन से जीने न देगी।
चार–
कौन किसे याद करता है, मर जाने के बाद,
फ़क़त ख़ौफ़ तारी है, ज़माना थू-थू न करे।
पाँच–
इतिहास में तो बहुत दर्ज़ हैं अर्सों से,
कौन किसकी सुधि ले पाया वर्षों से?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ मई, २०२० ईसवी)