धरो रूप समदर्शी का, रामराज है पास

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

राम-आचरण है कहाँ, किसमें कितना राम।
पाप-पंक में पाँव हैं, कहते जय श्री राम।।
राम जानते भक्त को, छद्म जानते राम।
छली-प्रपंची भक्त हैं, राम जानते नाम।।
अंकुश से जो दूर है, राम न उसके साथ।
सत्पथ पर जो चल रहा, रहे राम का हाथ।।
रामराज बाहर नहीं, भीतर देखो आप।
कलुषित त्याग विचार कर, तपो ताप से ताप।।
एक आँख तो बन्द है, कैसे दिखे समाज।
भगवन् भक्त अधीन हैं, देखो अपना आज।।
धरो रूप समदर्शी का, रामराज है पास।
शासन आयातित नहीं, नहीं बनो तुम हास।।
रामशक्ति धारण करो, मनुज नाम है राम।
अवगुण सारे दूर कर, भजो प्रेम से नाम।।
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ अगस्त, २०२० ईसवी।)