अभिव्यक्ति का कृष्णपक्ष

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रणयपंछी विकल उड़ने के लिए,
ताकता हर क्षण गगन की ओर है।
किन्तु ममता की करुण विरह-व्यथा,
ज्ञानपथ को आज देती मोड़ है।
धैर्य की सीमा सबल को तोड़कर,
दर्द की लतिका हरी बढ़ने लगी,
अर्चना के गीत को झटकार कर,
दर्द-दु:ख की उम्र है हँसने लगी।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० जून, २०२२ ईसवी।)