जीवन का सारांश

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

पत्नी उवाच :–
सम्बल अपनी बाँह का, कभी न देना छोड़।
कितना भी संकट रहे, दु:ख से करना होड़।।
हर जन्म हम संग चलें, ऐसी अपनी चाह।
खटपट भी होता रहे, अलग न होगी राह।।
पति उवाच :–
मीत! मन में हो तुम्हीं, बन जीवन-आधार।
अर्द्ध अंग बनकर रही, सदा उठाया भार।।
जीवन-वृत्त अनूप है, नहीं ठनेगी रार।
वक्ता भावी हूँ नहीं, कैसे कह दूँ सार।।
पत्नी उवाच :–
पति-पत्नी के प्रेम का, कहीं नहीं है जोड़।
सप्तपदी की गाँठ का, नहीं दिखे है तोड़।।
मानव अवगुण से भरा, फिर भी बहुत महान्।
जीवन-रस पीता सदा, गुण-अवगुण पहचान।।
पति उवाच :–
मंज़िल पास न आ सके, साथ-साथ हम संग।
है दुर्बल तन दिख रहा, छिटके कभी न अंग।।
प्राणप्रिये! मन में बसो, बाहर होता जंग।
मन-से-मन मिलता कहाँ, बदले जग के रंग।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)