जीवन के सिन्धु सेतु पर दिखा कई देशों का पहरा। जहाँ, बह गई निजता, मनुष्यता सदा एक सानिध्य की चेष्टा। असंख्य आकांक्षाओं से निकली जीवन की एक सुंदर रेखा।
हमने जिसको देखा भावशून्य न ही कोई पीड़ा यह रह गया एक छोर जीवन के प्रति अनासक्त समग्र अंत नहीं! अंत नहीं जीवन का और वसंत यही।
आकांक्षा मिश्रा
गोंडा उत्तरप्रदेश