धरा पे जल सूख जाएगा तो भला तू कहाँ जाएगा

‘विश्व जल दिवस’ को व्यक्तिशः चिन्तन दिवस के रूप में मेरी प्रस्तुति
जगन्नाथ शुक्ल, (इलाहाबाद)

जब जल जल जाएगा तो जलजला आ जाएगा,
ग़र ख़ुद ही जल बचाएँगें तो हौंसला आ जाएगा।
गरम तवे पे जल गिरते ही कितना छनछनाता है,
धरा पे जल सूख जाएगा तो भला तू कहाँ जाएगा?
धरा पे जल सूख०……………………..………।।१।।
जो आँखों में सूख कर आँख पत्थर कर देता है,
जो धरती में सूख कर धरा को बंजर कर देता है।
जो सड़क सींचता है,औ नल खुला छोड़ देता है,
पीने को होगा नहीं , तो तू यहाँ कैसे नहाएगा ।।
धरा पे जल सूख०……………………..………।।२।।
काले-काले बादलों के दल कभी नभ में सुहाते थे,
दौड़- दौड़  घूम- घूम हँसी-ख़ुशी हम भी नहाते थे।
आज आर्द्रता भरे परिवेश में हम निचुड़ से जाते हैं,
स्वेद भी न बचेगा भाई,तो कैसे ज़िन्दगी बिताएगा।
आज कृत्रिम जीवन सब ख़ुशी-ख़ुशी जो बिताते हो,
मौसम को बदल कर  ओज़ोन  क्षरण को बढ़ाते हो।
है कोई कृत्रिम उपचार क्या जल को भी उपजाने का?
सोचो फ़्रिज, वाशिंग मशीन,बिना जल तू चलाएगा।
धरा पे जल सूख०……………………..………।।३।।
हमें प्रकृति से मिला ये अनमोल उपहार है मेरे भाई,
जो त्राणकर्ता है प्राणों का ,उसको मिटा बनते कसाई।
हमें नहीं कुछ करना है, इस धरा का वैभव रखना है,
सौगन्ध ले जीवन भर जल की एक-एक बूँद बचाएगा।
धरा पे जल सूख०……………………..………।।४।।