बीती रजनी, रीती सजनी

बीती रजनी, रीती सजनी,
अब क्या सोचे, अब क्या भाये ?
अविचल-अवनी, सस्चल घटनी,
मन की चीती, कब हो पाये ??

आनन्दयुक्त, संवेद मुक्त,
निःशब्द सुधा, पर नहीं व्यक्त ।
लवलेश संलयन की क्षणदा,
मनजा विलीन कब हो पाये?

शतपथ में बनी, सत्पथी सी ।
श्री-युक्त वदन, चित विकली सी।
व्यामोह व्यथा में पिघली सी ।
कब धैर्य बाँध मुझको पाये ?

संवाद मुक्त, संक्लेश मुक्त,
उन्मुक्त सृजन की धारा में।
संज्ञा अशून्य, अक्षय अमूल्य,
संसृति समूल्य, कब हो पाये ?

पंकिल ममता, उर्मिल रमिता ।
आहत समता, याचक रमता ।
संदर्भित, गर्वित, आशान्वित,
प्रतिपुष्टि, सुमुखि,कब मिल पाये?

मैं विकल, विवर्तित,नमित,भ्रमित ।
तुम सरल सुभाषिनि, शमित, फलित।
आली सजनी, कमनीय कथा,
मन फिरता-फिरता भटकाये ।।

तुम रागमती, मैं मूढ़मती ।
दिग्दर्शिनि तुम, मैं जथाव्रती।
तुम गुनवन्ती, मैं धुनमन्ती,
कहँ योग – सुयोग बना पाये ?

रीती सजनी, री मन – रमणी !
कुछ क्षण चुप, फिर क्यों मुसकाये ?
आती रजनी, जाती रजनी,
चंचल विकल्प, कब रुक पाये ??

रचनाकाल अवधेश कुमार शुक्ला 15/10/1998 मूरख हिरदै, मूरखों की दुनिया
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21/06/2023
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