आवर्तन और परावर्तन

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
मृग-मरीचिका-सा लगे, मार्ग दिखे विश्रान्त।
पथ का राही सोच मे, चंचल मन अब क्लान्त।।
दो–
अलख जगाता फिर रहा, मिला नहीं भगवान्।
अन्तस्-स्वर से दूर हो, पाता है अपमान।।
तीन–
युग का लक्षण दिख रहा, दिखे न ख़ुद का मान।
जीवन घटता आ रहा, कहीं न गरिमा-गान।।
चार–
मन कहता मग है इधर, भटकाये क्यों कान।
एक घड़ी तू ठहर ले, क्यों करता मन दान।।
पाँच–
जगजीवन जो जीत जा, बना रहे धनवान्।
अन्धी गलियाँ हर जगह, मत कर तू विषपान।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ नवम्बर, २०२१ ईसवी।)