★आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
निरभ्र आकाश में
मखमली वितान के नीचे
गोटेदार चादर पर
विराजमान सितारे
वसुन्धरा का
श्रृंगार (शृंगार) कर रहे हैं।
कुछ ऐसे अबूझ रास्ते हैं,
जो पहाड़ों के दामन में
वर्षों से सुस्ता रहे हैं।
मीलों दूर विस्तृत
रेत के सागर के आरोह-अवरोह
कभी मन्द्र तो कभी तार सप्तक में
हवा के टीले से टकरा रहे हैं।
पेड़ों के साये में
अलसाई चाँदनी
लहरों के होठों से निकलते
सरगम को सुनकर मन्त्रमुग्ध है
और
उधर नायिका
अलाप भरने को आतुर।
विशेष : ‘श्रृंगार’ की शुद्ध वर्तनी मेरे मोबाइल में उपलब्ध नहीं है। यहाँ प्रयुक्त ‘श्रृंगार’ शब्द अशुद्ध है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ फरवरी, २०२१ ईसवी।)