● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
वर्ष २०१४ मे देश को आज़ादी मिलते ही देश के समस्त समाचार-चैनलों के अधिकारियों को ‘रतौंधी और ‘दिनौधी’ ने जकड़ लिया है। उन्हें ‘ज्ञानवापी’ ‘मथुरा’ ‘ताजमहल’, ‘कुतुबमीनार’ आदिक के अलावा अन्य कोई विषय दिख ही नहीं रहा है और उन्हें ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ की जनघाती आर्थिक नीतियाँ दिख नहीं रही हैं अथवा उसे देखने का साहस कर नहीं पा रहे हैं। उन्हें मालूम है कि कथित सरकार के छिद्रालय मे यदि घुसने का प्रयत्न करेंगे तो उनके पीछे ई० डी०, सी० बी० आइ० आदिक भूत-प्रेत छोड़ दिये जायेंगे। यही कारण है कि लगभग सभी समाचार-चैनल ‘करबद्ध मुद्रा’ मे प्रशस्ति-वाचन करते लक्षित हो रहे हैं।
‘गोदी ऐण्ड कम्पनी’ सरकारी गोदी मे बैठकर पुरुआ-पछुआ का आनन्द ले रही है, जबकि देश की औसत जनता ‘तेल-पानी’ जुटाने मे ही अपनी ज़िन्दगी खपाये रही है। निर्लज्ज मीडियाकर्मियों को उनका दु:ख-दर्द दिख नहीं रहा है। यदि दिख भी रहा हो तो साहस नहीं हो पा रहा है कि कथित निर्दय-निर्मम सरकार की जनघाती आर्थिक नीतियों को तार-तार कर दें। वे जानते हैं कि वैसा करने से उनका मालिक ‘पिछवाड़े’ पर पदप्रहार कर, बाहर का रास्ता दिखा देगा। यही कारण है कि ‘गोदिया ऐण्ड कम्पनी’ के उत्पाद के रूप मे जानी-मानी संवाददाताएँ उचक-उचककर और लचक-लचककर ‘सरकारी सोहर’ गाती दिख रही हैं। पुरुषत्व से विहीन क्रीतदास-सदृश संवाददाता वही ‘मोदी-धुन’ गाते-बजाते-सुनाते-दिखाते आ रहे हैं, जिसके लिए उन्हें आयात किया गया है।
ऐसे मे, यक्ष प्रश्न है, जनसामान्य को महँगाई, बेरोज़गारी तथा भ्रष्टाचार की चक्की मे क्यों पीसा जा रहा है और ‘न्यू इण्डिया की बीभत्स मोदी-सरकार’ इस पर मौन क्यों है? सबसे महत्त्व का प्रश्न– विपक्षी दल लक़्वाग्रस्त क्यों और कैसे हो गये हैं?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ जून, २०२२ ईसवी।)