● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
हास को
इतिहास मत बनने दो;
उपहास को,
परिहास मत बनने दो।
आगत-अनागत
थाली मे तेल-बाती लिये,
प्रतीक्षा सह रहे हैं;
बाट जोह रहे हैं; उस पल का,
जब तुम अपने होने
अथवा न होने की प्रतीति का,
अनुभव कराओगे।
मेरे दोनो कन्धों पर
एक अपरिचित भार लाद दिया गया है,
जिसे मै अन्यमनस्क भाव से,
कभी तुम्हारी ओर ले जाता हूँ
तो कभी अपनी ओर ले आता हूँ।
माना, रात काली नागिन-सी
मेरी आँखों के सामने से
सरकती आ रही है,
जो अभीष्ट नहीं है।
शेष, अवशेष तथा अशेष
अँगुलियों के पोरों पर,
मदन-नृत्य करते हुए,
मानो दूर गगन मे
विविध आकार लेते विरहिणी
के अंगभार को,
शिथिल करने के प्रयास मे,
विरह-ज्वाला को
वय-वार्द्धक्य की भाँति,
गति देते लक्षित हो रहे हों।
आओ!
शमन के पथ को,
अनुभूतियों के बन्दनवार से आवृत करता
एक ऐसा आकार दें,
जो अन्त:सलिला-सदृश
हमारे मन-प्राण को,
अभिसिंचित करता रहे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)