● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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(इस शब्दशक्ति का प्रहार उन पाखण्डी काँवरियोँ पर किया गया है, जो काँवरयात्रा के नाम पर सरे आम ‘आतंक’ फैलाते और ‘दुराचरण’ करते देखे जा रहे हैँ।)
एक–
कैसे-कैसे दिख रहे, काँवर ढोते लोग!
सुर-सुरा और सुन्दरी, राह लगायेँ भोग।।
दो–
पूजा केवल आड़ है, मूल गुण्डई कर्म।
काँवर ख़ुद खण्डित करेँ, तनिक न आये शर्म।।
तीन–
शिवपूजन के नाम पर, खेल घिनौना खेल।
जनमानस भी त्रस्त है, दिखे न कोई मेल।।
चार–
घोर पाप मन मे दिखे, खण्डित पूजन-कर्म।
नहीँ सँभलता आचरण, छिन्न-भिन्न है धर्म।।
पाँच–
बोलेँ ‘हर-हर’ हर जगह, कर्म दिखे है वाम।
राह अराजक दिख रहे, गुण्डे दिखते आम।।
छ: –
देखो! शासक मौन है, आतंकी हर ओर।
मारधाड़ मे लिप्त हैँ, जनता करती शोर।।
सात–
सहनशीलता दूर है, लगा धर्म का रोग।
त्याग-तपस्या-साधना, मन से मन का योग।।
आठ–
लाख-करोड़ोँ मे दिखे, शायद कोई एक।
सत्यधर्म-पालन किये, मिलता कोई नेक।।
नौ–
धर्म-कर्म के नाम पर, पाखण्डी हर ओर।
देखो! पापी हर तरफ़, जनता करती शोर।।
दस–
करता मन है प्रश्न अब, कैसा काँवर-धर्म?
काँवर छूता तनिक भी, मर जाती है शर्म?
ग्यारह–
लम्पट-गुण्डे कर रहे, मारपीट-विध्वंस।
काँवरधारक बन गये, मिला न
हर का अंश।।
बारह–
वाहन क्षति पहुँचा रहे, सैनिक को देँ पीट,
महिला अपमानित करेँ, तन-मन कलुषित कीट।।
तेरह–
लक्ष्य दिखे विस्मृत यहाँ, हैँ विवेक से दीन।
शिक्षा पर भी प्रश्न यहाँ, काँवर ढोते हीन।।
चौदह–
खुली सड़क पर गुण्डई, काँवरिये-उत्पात।
मनबढ़ केवल दिख रहे, थोड़ी-थोड़ी बात।।
पन्द्रह–
संरक्षक सरकार दिखे, तभी गुण्डई लीन।
नीचे से ऊपर दिखेँ, केवल हीन-विहीन।।
सोलह–
मेहरबानी क्योँ भला, करती है सरकार?
भगवा, हिन्दू लोग से, केवल है दरकार!
सत्रह–
राजनीति है ‘वोट’ की, दलित और पिछड़ी जाति।
बहु काँवरिये यही हैँ, लम्बी दिखती पाँति।।
अट्ठारह–
सेँधमार का खेल है, बाह्य है केवल प्रीति।
सिँहासन आबाद रहे, राजनीति की रीति।।
उन्नीस–
लिख परिभाषा पतन की,
काँवर-धारक लोग!
उद्धत रूप लिये हुए, फैलाये हैँ रोग।।
बीस–
श्रद्धा मन मे यदि बसे, कर लो शिव का ध्यान।
खिँची हुई तलवार को, अन्दर कर लो म्यान।।
इक्कीस–
पोषण करो मनुष्यता, यही मूल है धर्म।
काँवरधारण-कर्म का, पहले जानो मर्म।।
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