एक बेग़ाने के नाम पत्र

आकांक्षा मिश्र-


पिछले कुछ दिनों से
देख रही हूँ
तुम व्यवस्थित जीवन जीने के लिए
घर का नक्शा बदल रहे हो ।
साथ ही जीने का सलीका भी ।
अच्छा है गतिमान जिंदगी के
कई प्रतिमान
बदलते हुए अनुभव कोरे कागज पर
लिखे जाते है ।
मैंने तुम्हें करीब से व्यथित देखा है
अँधेरे में रहने की आदत तुम्हारी है
और रह भी रहे हो ।
ये मौसम बदलने की दस्तक है
इसी बदलते मौसम में
औरतें सतर्क हो जाया करती हैं
चिन्तित भी
घर और परिवार के प्रति वफादार भी
भली-भाँति मालूम है यह बात तुम्हें ।
अभी देखो गुड़हल का पौधा
पानी के लिए नहीं तरसता
भौंरा भी अनायास ही मंडराया करता है ।
तुम समाज के प्रति वफादार हो ।
इतने भी नहीं कि
सही वक्त की तलाश
रात्रि बारह बजे भी
मोबाइल में व्यस्त हो ।
खैर ये
व्यवस्थित जीवन शैली के लिए
तुम्हारे द्वारा बनायी गयी समय-सारिणी है
जिसे चला रहे हो मनचाहे ढंग से ।
मुझे लिखने हैं कुछ खत
विगत वर्षों में जो मिले हैं
तुम्हारे सानिध्य में ।
हमें लिखने हैं
जीवन शैली के बदलते हुए नए प्रतिमान ।
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