क्यों मिली थी हमें फिर सज़ा देर तक

भावना दीपक मेहरा (कमला नगर, आगरा)-


हम न समझा सके क्या हुआ देर तक
औ तमाशा वहां पर लगा देर तक ।

की नहीं हमने कोई खता थी मगर
क्यों मिली थी हमें फिर सजा देर तक ।

बस सितम हर कदम तुम तो करते रहे
हम नहीं हो सके बेवफ़ा देर तक ।

जीत के तुम नशे में बढे जा रहे
कब सुनी थी हमारी सदा देर तक ।

रुखसती जब हुई तो सभी ने कहा
तुम रुके ही नहीं हो जरा देर तक ।

‘भावना’ ये जमी भी सिसकने लगी
आस्मां भी तड़पता रहा देर तक ॥