
सुधेश-
चलते चलते हाथ पाँव थकते
चलने की चाह नहीँ मरती
देखते देखते आँखेँ धुँधलातीँ
देखने की चाह नहीँ मरती
दुनिया की चखचख सुनते
कान बधिर
सुनने की चाह नहीँ मरती
घर बाहर का सब खा
उम्र बिताई
खाने की चाह नहीँ मरती
इतनी लम्बी उम्र बिताई
जीने की चाह नहीँ मरती
तन बूढा समय के साथ
मन नहीँ बुढाता
जब तक सँवेदन
तब तक ही जीवन ।