जगन्नाथ शुक्ल, (इलाहाबाद)【१】बड़े एहसान हैं मुझ पे ,जो तुम्हारा सानिध्य है कविते!
बरक़त से भरी ज़िन्दगी, हृदयतल से वन्द्य है रचिते!
अहर्निश कल्पना करता , उकेरूँ अक़्स शब्दों से,
भरी हैं अश्क़ से नज़रें, प्रतीक्षारत सद्य है वनिते!
【२】तुम्हारे दृग दमकते है, हँसी उन्मुक्त होती है,
तुम दिखती नहीं हिरणी, तो भावना सुप्त होती है।
चेतनाशून्य हो करके , भ्रमर -सा मन भटकता है,
विवश हो व्यथित उर में, पिपासा गुप्त होती है।।
【३】ग़र लब कुछ न कहें,न समझो निगाहें सुप्त होती हैं,
हृदय में न बजे वीणा, न समझो तमन्ना लुप्त होती हैं
मेरे रोम- रोम में तेरी मुहब्बत ही, समाई है मदनिके!
मदन रस की आस भर से, न इन्द्रियाँ तृप्त होती हैं।।
【४】भ्रमर बन फूल की डाली में, तुम क्यों सज्य हो बैठे ?
खिली मुसकान को देखे, तो मदन क्यों क्रुद्ध हो बैठे?
बड़ी शीतल-सी है छाया, मन में उठती हिलोरे हैं मेरे,
अभी तो प्रेम का पल है, तुम त्वरित क्यों शुद्ध हो बैठे?
【५】मुबारक़ हो तुम्हें मेरी इन आँखों का सजा पानी,
बिना दिल की गवाही के,तूने कर डाली ये नादानी।
बिना मौसम ही ये बादल बरस जाएं तो क्या होगा?
भला बंजर पड़ी धरती को, क्या मालूम ज़वानी?