ऐ मौत तूने तो जमींदार बना दिया

आदित्य कर्ण दरभंगा, बिहार (मिथलांचल)


ऐ मौत तूने तो जमींदार बना दिया।
जब ज़िंदा था तो घूमता था, दर-ओ-बदर,
अब मर गया तो इतना बड़ा श्मशान दिला दिया।
भटकते रहे उम्र भर, चैन-ओ-सुकून के लिए,
अब जाकर हमेशा के लिए मुझको सुला दिया।
ऐ मौत तूने तो ज़मींदार बना दिया।
चल पड़ा था रोटी कमाने इस जमाने में,
न जाने कब उम्र ही पूरी बीत गई इसी बहाने में।
सोता नहीं था कभी भी गोली के बगैर,
अब सोया हूँ बेफिक्र हो कर तो लगे हैं सब जगाने में।
रूठें हैं सब अपने मुझ से,

उठा नहीं तो न जाने क्या खता कर दिया,
अर्थी सजाई मेरी और मुझको ही जला दिया।
ऐ मौत तूने तो जमींदार बना दिया।
जरा सा मर क्या गया इत्तेफाक से,
की इतना बड़ा श्मशान दिला दिया।