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धू-धू जलती है चिता, लावारिस है रूप

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
मातम पसरा हर दिशा, मुखिया दिखता मौन।
कितना निर्दय दिख रहा, इसे बताये कौन?
दो–
लाशों का अम्बार है, चीख़-दहाड़ें रोज़।
बेशर्मी है नाच रही, कौन करेगा खोज?
तीन–
बाप मरा-बेटा मरा, घर-घर छाया शोक।
माँ का साया उठ रहा, कोई रोक-न टोक।।
चार–
क्रन्दन से घर-घर भरा, आँसू हैं लाचार।
मौत बग़ल में है खड़ी, आँखें होतीं चार।।
पाँच–
धू-धू जलती है चिता, लावारिस है रूप।
देखो! निर्मम सब खड़े, भंग पड़ी है कूप।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ अप्रैल, २०२१ ईसवी।)

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