● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
त्राहि-त्राहि जन कर रहे, मुखिया उड़ा विदेश।
संकट मे जन-धन यहाँ, मुखिया बदला वेश।।
दो–
जल बढ़ता हर पल यहाँ, कोई नहीं हवाल।
आशा पल-पल पल रही, कोई नहीं वबाल१।।
तीन–
इंच-इंच पानी बढ़े, आँखभरा है त्रास।
जाने कितने जन यहाँ, मौत बने हैं ग्रास।।
चार–
वर्षा मूसलधार२ यहाँ, प्रलय का खिंचता चित्र।
ढाढ़स देती हर दिशा, दिखते नहीं हैं मित्र।।
पाँच–
नाकामी सरकार की, केवल चाहे वोट।
जनता मरती तो मरे, मारे हरदम चोट।।
१शुद्ध शब्द ‘वबाल’ है, ‘बवाल’ नहीं।
२उपयुक्त शब्द ‘मूसलधार’ है, ‘मूसलाधार’ नहीं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १४ जुलाई, २०२३ ईसवी।)