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समय की मुसकुराहट

★ बिम्ब-विधान और प्रतीक-योजना का अनुशीलन करें।

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आज
महुआ
टपकना भूल-सा गया है।
फुनगी पर बैठी गौरैया
चहकना भूल-सी गयी है।
तितली
पंखों को सिमटाये
सशंक नेत्रों से
कुछ ढूँढ़-सी रही है।
कोटर से झाँकता उल्लू
बूढ़े अजगर की पीठ पर
क़दमताल-सा कर रहा है।
सहमी-सकुची हवा
दिशाएँ बदलने के लिए
योजनाएँ बना रही है
और
समय मुसकुरा रहा है,
मनुज की दनुजता पर।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ मार्च, २०२१ ईसवी।)

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