अब कब तक रामराज के ख़्वाबों को पालोगे?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


चैनो सुकूं हो मुल्क में, कुछ सोचिए हुज़ूर!
ग़द्दार हैं सब दिख रहे, कुछ सोचिए हुज़ूर।
सरहद पे गोली खा रहे, फ़ौजी को देखिए,
भाषणबाज़ी से क्या होगा, कुछ सोचिए हुज़ूर।
सौ रुपये की माला चढ़ा, कुछ फ़ुर्सत हो लिये,
परिवार आँसू पी रहे, कुछ सोचिए हुज़ूर!
अब बरदाश्त नहीं, जुम्ला नक़्ली सिंह का,
शहादत में आये फ़ासला, कुछ सोचिए हुज़ूर!
घरभेदी भी सरकार में, पर सब पूजे जा रहे,
‘ज़िन्दाबाद इन्क़िलाब’ पर, कुछ सोचिए हुज़ूर!
बुद्धिजीवी पाले जा रहे, चन्द टुकड़ों पे हर सू,
‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ पर, कुछ सोचिए हुज़ूर!
अब कब तक ‘रामराज’ के ख़्वाबों को पालोगे ?
धरती पे जो है दिख रहा, कुछ सोचिए हुज़ूर!
पुरुवा चले या पछुआ, अब सब एक बात है,
ठण्ढी पड़ी है गरमी पर, कुछ सोचिए हुज़ूर!
सब तान कर रजाई, कैसे अलसाये पड़े हैंं,
अब इनके ठण्ढे ख़ून पर, कुछ सोचिए हुज़ूर!
( सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद ; २९ अप्रैल, २०१८ ई०)