योग भोग है दिख रहा, भीतर गहरा कूप

एक–
अन्त: बैठा साधु है, बाहर अन्धा कूप।
मृगमरीचिका-से लगेँ, मनमोहक ज्योँ रूप।।
दो–
योग भोग है दिख रहा, भीतर गहरा कूप।।
डूब रहे माया लिये, जग का रूप अनूप।।
तीन–
भेदभाव से दूर हो, साधु यही है चाह।
सबके भीतर जीव है, अलग दिखे क्योँ राह।।
चार–
मेरा राम रहीम है, तेरा अपना कौन?
बाँट रहे सब कह इसे, देख रहा प्रभु मौन।।
पाँच–
देश गर्त की ओर है, नहीँ समझते लोग।
धर्म-जाति मे बाँटकर, कुत्सित करते भोग।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ जनवरी, २०२५ ईसवी।)