● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
एक–
टूट रहे तटबन्ध हैँ, जल का हाहाकार।
प्रलय आँख मे नाचता, लिये मृत्यु आकार।।
दो–
चाहत पूरी कर रहा, ले निर्मम-सा रूप।
जनता मरती देश मे, निर्दय कितना भूप।।
तीन–
हा धिक्-हा धिक्! कर रही, क्रन्दन जन-जन देह।
निर्मम शासन देश का, शुष्क दिख रहा नेह।।
चार–
मुखिया भारत देश का, राजनीति मे लीन।
आँखेँ बेबस दिख रहीँ, हो कौड़ी के तीन।।
पाँच–
ठहरी-सहमी ज़िन्दगी, सकुची-सिसकी देह।
ताल ठोँकती हर नदी, उजड़ रहा हर गेह।।
छ:–
मन व्याकुल हो रो रहा, हर दिन मरती देह।
बिजली चमके हर घड़ी, गर्जन करते मेह।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ जुलाई, २०२४ ईसवी।)