★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
पुरवइया हलकान है, पछुआ करे न बात।
घूँघट दिखती साँझ है, सूरज मारे लात।।
दो–
लू चलती ज्यों आग है, आँख उठे यों पीर।
ऋतु कोलाहल यों पड़े, दहक रहा ज्यों तीर।
तीन–
मन तो बहुत अशान्त है, तन ज्वाला का रूप।
सूरज तिरछी आँख है, डगमग करती धूप।।
चार–
धरती का कण-कण जरे, जरे जीव का गेह।
धूप बरसती यों लगे, मानो जलती देह।।
पाँच–
ग्रीष्म-तपन सर्वत्र है, दग्ध विरह का रूप।
मृगमरीचिका यों दिखे, धधक रहा हो कूप।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)