ज़ेह्न में वह घूमता सवाल की तरह

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

– डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


वह बिछड़ता है, कमाल की तरह,
हवा हो जाता है, रुमाल की तरह।
कहाँ से लाऊँ लौटाने की तरक़ीब,
ज़ेह्न में वह घूमता सवाल की तरह।
अच्छा है वह कहीं और चला जाये,
डर है कहीं आ जाये वबाल की तरह।
सोया हुआ ज्वालामुखी-सा दिखे है,
जाने कब जग जाये उबाल की तरह।
बिन पेंदी का लोटा-सा डगरता है रहा,
हाथ नहीं लगता वह उछाल की तरह।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २८ अप्रैल, २०१८ ई०)