चाल, चरित्र औ चेहरा, कैसे-कैसे लोग ।
कथनी-करनी में लगा, जैसे विकृत रोग ।।
जैसे विकृत रोग, समझ न आती माया ।
भोले- भाले दीखते, तले स्वार्थ की छाया ।।
खुद पर संकट जब पड़े, चहें मदद कर जोड़ ।
औरन पर संकट दिखे, निज मुख लेते मोड़ ।।
अवधेश कुमार शुक्ला
मूरख हिरदय
17/08/2020