जगन्नाथ शुक्ल ‘जगन’, प्रयागराज :

आँखों के विरहाग्नि स्वेद से, भ्रम सारे छँटने लगते हैं;
सुधियों की साँकल बजने से, मन के पट खुलने लगते हैं।
प्रेयसि आने भर से मौसम,
पतझड़ से वसन्त हो जाता।
कागा के कण्ठों में बरबस,
आ कर के रसराज समाता।
प्यासे मरुथल की छाती का,
टूटा हर कोना है हर्षित ;
पोर-पोर हो रहा तरंगित,
मेघ नेह का नीर बहाता।
बिछुड़न की टीसें घटती हैं, घाव सभी भरने लगते हैं;
सुधियों की साँकल बजने से, मन के पट खुलने लगते हैं।
पायल की रुनझुन बजने से,
साँसों की लड़ियाँ जुड़ती है।
बत्तीसी से जलती बिजली,
होंठों से मदिरा बहती है।
काजल की सीमा के भीतर,
मुझको मेरी छवि दिखती है;
साथी तेरे होने भर से,
जीने की इच्छा बढ़ती है।
सूरत के मिटने से पहले, मूरत हम गढ़ने लगते हैं;
सुधियों की साँकल बजने से, मन के पट खुलने लगते हैं।
टूटे मन के चौबारे में,
यों आना अच्छा लगता है;
चुम्बन मिलने की आशा में,
खिल जाना सच्चा लगता है।
सपने जैसे लगता ये पल,
कैसे कर लेता विश्वास;
रिश्तों की दरकी जमीन पे,
बना महल कच्चा लगता है।।
आँख खुली पहलू में बैठे, चित्र सभी मिटने लगते हैं।
सुधियों की साँकल बजने से, मन के पट खुलने लगते हैं।