राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’

ओ वीणापाणि माँ ! ओ पुस्तक धारिणि माँ !
ओ ज्ञान दायिनी माँ ! ओ हंसवाहिनी माँ !
कर तम का संहार ज्ञान की ज्योति देती माँ ।
ओ वीणापाणि माँ ! ओ पुस्तक धारिणि माँ !
विद्या की देवी हो माँ जीवन सूत्र तुम ।
नदियों के कल-कल की अप्रतिम ध्वनि तुम ।
विहगों के कलरव का संगीत मेरी माँ ।
ओ वीणापाणि माँ ! ओ पुस्तक धारिणि माँ !
अछिन्न हो अभिन्न हो माँ अपराजेय हो ।
दर्शन हो जीवन का अभिव्यक्ति मातु हो ।
वेदों का मूल माँ शास्त्रों की ज्योति माँ ।
ओ वीणापाणि माँ ! ओ पुस्तक धारिणि माँ !
आधार उत्सव का माँ श्वेता आप हैं ।
संस्कृति और संस्कार का प्रतिबिम्ब आप हैं ।
जड़ को कर चेतन सद्बुद्धि देती माँ ।
ओ वीणापाणि माँ ! ओ पुस्तक धारिणि माँ !
पाणिनि के सूत्र माँ तुलसी की मानस माँ
अभिज्ञान कालि का गीता की ज्योति माँ
साधक की साधना कवियों की आत्मा
ओ वीणापाणि माँ ! ओ पुस्तक धारिणि माँ !