व्यक्ति नश्वर है।
सिद्धांत शाश्वत है।
व्यक्ति नष्ट हो जाते हैं।
सिद्धांत स्थिर रहता है।।
सत्य प्रेम न्याय पुण्य शाश्वत एवं सनातन सिद्धांत हैं।
दार्शनिक सिद्धांत पर आधारित धर्म ही सनातन, शाश्वत और स्थायी हो सकता है।दूसरा कुछ भी नहीं।
व्यक्ति का धर्म सत्य है।
परिवार का धर्म प्रेम है।
समाज का धर्म न्याय है।
समष्टि का धर्म पुण्य है।
इस चार आयामी सैद्धांतिक धर्म को त्यागने वाले लोग ही आज हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध पारसी बहाई इत्यादि बनकर बैठे हुए हैं। और चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है।
सत्य प्रेम न्याय पुण्य के चार आयामी सनातन धर्म को पुनः स्वीकार करते ही यह धरती पर चारों ओर सुखशांति का वातावरण उत्पन्न हो जायेगा।
सत्सिद्धांत लागू होते ही सत्युग वापस आ पहुचेगा। सत्पथ ही सत्युग का द्वार खोलता है।
लेकिन कोई राम पर आधारित है।
कोई कृष्ण पर आधारित है।
कोई बुद्ध पर आधारित है।
कोई महावीर पर आधारित है।
कोई जीसस पर आधारित है।
कोई मुहम्मद पर आधारित है।
कोई कबीर पर आधारित है।
कोई नानक पर आधारित है।
कोई दयानंद पर आधारित है।
कोई विवेकानन्द पर आधारित है।
कोई गांधी पर आधारित है।
कोई हेडगेवार पर आधारित है।
कोई झंडे पर आधारित है।
कोई ओशो पर आधारित है।
कोई तीर्थ पर आधारित है।
कोई श्मशान पर आधारित है।
कोई शिव पर आधारित है।
कोई विष्णु पर आधारित है
कोई ब्रह्मा पर आधारित है।
लेकिन संसार में सत्सिद्धांत पर आधारित कोई भी धर्म नहीं है।
सत्युग कैसे आता…?
सत् के सिद्धांत से ही भाग चुके हैं लोग।
सत् प्रकाश है ज्ञान है दर्शन है।
सत् के दार्शनिक सिद्धांत को त्यागते ही धर्म नष्ट होने लगता है।सत्धर्म हटते ही युग का पतन होने लगता है।सत्युग ही पतित होकर कलियुग हो जाता है।
ठीक ही कहा गया है–
“सत्ता की पूजा चले,
सत्य न पूजा जाय।
पूजा हो यदि सत्य की,
युग सत्युग हो जाय।।”
जैसे जैसे धर्म की हानि होती है। समय खराब होता जाता है।
युग का ह्रास होता जाता है।
दुर्गुण दरिद्रता दुःख और दासता बढ़ने लगती है।
सत्धर्म को पुनः स्वीकार करो..!
देश और दुनिया का उद्धार करो..!!
✍️???????? (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)