#RenamingCommission
हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं।
हमें धार्मिक और सांस्कृतिक आजादी चाहिए।
राष्ट्रीय स्तर पर #नामकरण_आयोग बनाने और वहशी विदेशी लूटेरों और आक्रांताओं के नाम पर बने कस्बों और शहरों के नाम बदलने की मांग वाली PIL पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है।
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स्थाई समाधान;
धार्मिक आज़ादी से पहले वास्तविक धर्म क्या है उसे जानना अनिवार्य है.
रही बात सांस्कृतिक आज़ादी की तो ध्यान रहे सांस्कृतिक आज़ादी के लिए मौजूदा धनपशुओं और राजनीतिज्ञों को देश के सभी सार्वजनिक अवसर व संसाधनों पर से पहले कब्ज़ा छोड़ना होगा.
क्या मौजूदा सुप्रीमकोर्ट यह करवा पायेगा?
क्योंकि बिना अवसर व संसाधनों की आज़ादी के दुनिया में कोई भी सांस्कृतिक आज़ादी कायम नहीं की जा सकती.
धर्म कोई मजहब/समुदाय से संबंधित विषयवस्तु नहीं बल्कि धर्म मानवजीवन विकास का व्यवहारिक अर्थात सामाजिक उत्थान से जुड़ा विषय है जिसका सीधा संबंध न्यायशील नियम निति निर्णयों पर आधारित मानवीय समाज को प्रतिष्ठित करने से जुड़ा है.
क्या आप जड़पदार्थ, वृक्ष-वनस्पति, पशु-पक्षियों एवं मनुष्यों के लिए न्यायोचित नियम निति निर्णयों पर आधारित समाज निर्माण के विषय पर सर्वज्ञ हैं?
यदि नहीं तो रुकिए!
क्योंकि धर्म का सम्बन्ध उपरोक्त चारों से है और एक गलत नियम निति निर्णय से इन चारों पर बुरा असर पड़ेगा.
इसलिए सैद्धांतिक रूप से धर्म क्या है इसके दार्शनिक महत्व को जान ले.
यह कोई 1 दिन में सर्वज्ञ बनने का विषय नहीं बल्कि व्यापक है इसलिए कुछ समय दर्शन शिक्षा पर लगाइये अवश्य आपको मार्गदर्शन मिलेगा.
बांकी दुनिया के सभी मनुष्यों को दुर्योधन बने रहने की पूर्णतः आज़ादी है.
आप आलू से यदि समोसा बनाना चाहते है और उस समोसे को खाना चाहते हैं तो जान ले इस प्रक्रिया के दार्शनिक पहलु को.
क्योंकि आलू संसाधन है.
समोसा बनाने की प्रक्रिया (कला) ही सांस्कृतिक विषयवस्तु है.
समोसा बनकर तैयार होना ही सभ्यता है.
और समोसे को खाना ही सिद्धांत है.
अर्थात बिना संसाधन के संस्कृति नहीं पनप सकती और बिना संस्कृति के सभ्यता और बिना सभ्यता के सिद्धांत नहीं बन सकते.
ये उपरोक्त प्रक्रिया ही वास्तविक धर्म है.
इसलिए पहले धर्म के विषय को जानिये समझिये और स्वीकारिये.
क्या आप मौजूदा धूर्तों के चंगुल से पहले जड़वस्तुओं, वृक्ष-वनस्पतियों, पशु-पक्षियों एवं मानवजाती के सांस्कृतिक उत्थान से जुड़े अवसर व संसाधनों को आज़ाद कराने हेतु तैयार हो?
जबतक उपरोक्त चारों का समुचित अर्थात न्यायोचित सांस्कृतिक उत्थान नहीं होगा तबतक न्यायोचित सभ्यता विकसित नहीं हो सकती और न ही सिद्धांत.
आप जो दौड़धुप कर रहे हैं यह मौजूदा अनपढ़/गँवार बुद्धिजीवियों की नज़र में अधिक महान कार्य हो सकता है लेकिन विवेकवानो की नज़र में नहीं.
इसलिए बुद्धिजीविता से ऊपर उठकर विवेकवान बनने की राह की ओर अग्रसर होईये.
इसके लिए एक ही रास्ता है आप दुनिया के सबसे महान भारतीय दर्शन व कुछ पश्चिमी देशों के दर्शन विषयों को पढ़िए व उन्हें समझने हेतु सुपात्र गुरु के सानिध्य में रहिये कुछ समय.
फिर ये सभी कार्य स्वतः सुव्यवस्थित होने शुरू होंगे और आप नीतिगत विषयों, वैधानिक विषयों व आचरण एवं व्यवहारिक विषयों के अंतर को समझ पाएंगे व तर्कशील बनेंगे.
हमारे बहुत से जज व वकील मित्र हैं जिन्हे भारतीय संविधान के वास्तविक दार्शनिक पहलुओं का सही ज्ञान नहीं.
उन्होंने तुलसीकृत चौपाई “ढोर गँवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी” तो पड़ लिया लेकिन इसके दार्शनिक पक्ष को नहीं समझ पाए इसलिए अर्थ का अनर्थ करते फिर रहे हैं.
जबकि इस चौपाई के एक शब्द में इतना बड़ा दर्शन छुपा हुवा है की पूरी दुनिया आश्चर्यचकित रह जाएगी जब उन्हें इसका सही मायने पता चलेगा.
जिन्हे पता चल चुका है वे अब ज्यादा फुदकना बंद कर चुके हैं ख़ासकर अम्बेडकरवादी.
इसलिए धर्म और संस्कृति के दार्शनिक पहलु को जानिये समझिये फिर स्वीकारिये तब दुनिया के सामने आईये.
हम भी कुछ सालों पहले तक आपकी तरह ही सोंचते थे और करते भी थे लेकिन जबसे हमारा दर्शन विषय से पाला पड़ा तबसे हम क्या हैं और हमारी औकात क्या है यह आभास हुवा.
दुनियावी राजनीति और सच्ची राजनीति में सार्थकता बस इतनी है की एक अल्पकालिक है तो एक चिरकालिक अर्थात धार्मिक है सांस्कृतिक है साभ्यतिक है और वही सैद्धांतिक है.
तय आपको करना है की आप मौजूदा क़ुराजनैतिक बंदर बनकर बिना जाने समझे किसी भी विषय पर क़ुराजनीति करते फिरना है या फिर सैद्धांतिक रूप से न्यायनेता बनकर सुराजनीति करना है…
फिर कहते हैं “दुर्योधन बने रहने की आज़ादी सबको है”
!!शुभकामना!!
✍️???????? (रामगुप्ता – स्वतन्त्र पत्रकार – नोएडा)