‘सर्जनपीठ’ की ओर से ‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज, प्रयागराज मे २१ दिसम्बर को ‘शब्द-शब्द संधान’ के अन्तर्गत ‘मौखिक और लिखित भाषाओं मे विराम-चिह्नो की उपयोगिता’ पर चर्चा-परिचर्चा और कर्मशाला का आयोजन किया गया। अध्यक्ष और मुख्य अतिथि ने दीप-प्रज्वलन कर, समारोह का उद्घाटन किया था। अतिथिगण ने मा शारदा के चित्र पर माल्यार्पण किया था।
आरम्भ मे, भाषाविज्ञानी एवं समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने विरामचिह्नो के प्रकार और लक्षणों को सोदाहरण समझाते हुए कहा, ”हम किसी भी प्रकार के शब्द-सर्जन और वाक्यगठन के संदर्भ मे विरामचिह्नो की महत्ता की उपेक्षा नहीं कर सकते।”
आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी की पुण्यतिथि पर आयोजित शैक्षिक संगोष्ठी मे अध्यक्षता कर रहे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने बताया, “हम लोग विरामचिह्नो के महत्त्व को ठुकुराते आ रहे हैं, जबकि उनके अभाव मे भाषा और साहित्य की गति ठहर जाती है। वाक्य-प्रवाह को बनाये रखने के लिए विरामचिह्न एक अनुशासन है।”
मुख्य अतिथि चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय मे हिन्दी-विभाग की प्राध्यापक डॉ० सरोज सिंह ने कहा, “शिक्षक अपने को समर्थ मानता है, इसलिए व्याकरण के प्रमुख अंग विरामचिह्नादिक की उपेक्षा करता आ रहा है। यदि वही अध्यापक अपने विद्यार्थियों को व्याकरण-बोध कराये तो उनका हित हो सकता है। इसकी शुरुआत प्राथमिक शाला से करनी होगी।”
विशिष्ट अतिथि चौधरी महादेव प्रसाद महाविद्यालय की हिन्दी-विभागाध्यक्ष डॉ० आभा त्रिपाठी ने कहा, “यदि विद्यार्थियों को विरामचिह्नो के प्रति सजग और जागरूक नहीं किया जायेगा तो आगे चलकर प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं मे उन्हें असहजता का सामना करना पड़ेगा।”
सेण्ट मेरी लुकस स्कूल ऐण्ड कॉलेज मे हिन्दी के प्रवक्ता डॉ० धारवेन्द्रप्रताप त्रिपाठी ने बताया, ”विद्यालयों मे इसके प्रति विरक्ति है, जो कि घातक है। मीडिया मे सबसे अधिक विरामचिह्नो की दुर्गति की जा रही है।”
वरिष्ठ पत्रकार और कवयित्री उर्वशी उपाध्याय ने कहा, “समाचारपत्रों मे पहले ज्ञानी प्रूफ़रीडर होते थे; अब तो पत्रकार ही प्रूफरीडर भी होता है। ऐसे मे, विरामचिह्नो की उपयोगिता ‘न’ के बराबर है।”
प्रूफ़-रीडर और विद्यार्थी विनय तिवारी ने कहा, “मै सीख रहा हूँ और प्रूफ़-पठन के समय सजग भी रहता हूँ।”
अध्यापक वीरेन्द्र त्रिपाठी ने बताया, “बोलते और लिखते समय उपयुक्त विरामचिह्नो के प्रयोग करने पर मुझे प्रसन्नता होती है और गर्व भी होता है।”
केशव सक्सेना ने कहा, “विरामचिह्नो की उपयोगिता से इनकार नहीं कर सकते हैं।”
साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने संचालन और आभार-ज्ञापन किया। इस अवसर पर ज्योति चित्रांशी, चारुमित्र, कृष्णकुमार केसरवानी, डॉ० कृष्णकुमार केसरवानी आदिक उपस्थित थे।