मानवजीवन-विकास पर आधारित प्रश्नोत्तर

(मानवजीवन विकास पर आधारित प्रश्नोत्तर अवश्य पढ़ें व मनन करें)
1•प्रश्न;
मित्र और मित्रता की परिभाषा क्या है?
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उत्तर;
वास्तव में प्रेम से ही मैत्री का उदय होता है।
किसी का सहचर होना मैत्री का प्रथम चरण है।
मित्र सहचर से श्रेष्ठ होता है।
सहचर तो स्वार्थ के वशीभूत होकर भी बना जा सकता है।
किंतु मित्र बनने के लिए अपना EQ (इमोशनल कोसन्ट अर्थात भावनात्मक विकास-क्षत्रियत्व वर्ण) विकसित करना होता है।

मित्रता सहायक होती है।
मित्र हेतु स्वयं के लिए कष्ट भी स्वीकार करने की सामर्थ्य मैत्री से प्राप्त होती है।

EQ ही मैत्री को प्रकाशित करता है।
IQ (इंटलेक्चुअल कोसेंट अर्थात मानसिक विकास-बनियत्व वर्ण) और PQ (फिजिकल कोसेंट अर्थात शारीरिक विकास-शूद्रत्व वर्ण) स्तर के लोग किसी के सच्चे मित्र नहीं हो सकते।

QLess वाले मनुष्य तो सबके शत्रु ही होते हैं।
वे किसी के मित्र कदापि नहीं हो सकते।

मैत्री जब अधिक श्रेष्ठ के साथ हो तो उन्नत होकर श्रद्धा में बदल जाती है।
भावनात्मक संबंधो का द्वितीय चरण ही मैत्री है।
जो मनुष्य को श्रद्धालु बनाकर समर्पण के द्वार तक भी पहुचा सकती है।
वास्तव में EQ ही मैत्री का आधार है।

2•प्रश्न;
हमारे धर्मशास्त्रों में नर और नारायण का वर्णन है, नारायण तो स्वयं भगवान विष्णु हैं तो नर कौन थे?
साधारण बोलचाल की भाषा में नारी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, नारी का क्या अर्थ है?
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उत्तर;
नर्क में रहने वाले मनुष्यों को नर और नारी कहते हैं।
नर्क से नर-नारियों का उद्धार करने वाले देवता को नारायण कहते हैं।
असत्य की जीवनधारा को ही नर्क कहते हैं।
असत्यवादी लोग ही पंचपाप और पंचदोष से घिर जाते हैं इसी से उनका जीवन नारकीय हो जाता है।
भगवान विष्णु ही कर्मफल का न्यायसिद्धांत सिखाकर इन पापियों को नरक से निकाल कर न्यायप्रिय मानव बनाते हैं इसीलिए भगवान विष्णु को ही धर्मशास्त्रों में नारायण कहा गया है।

संस्कृत की नृ धातु से नारायण, नर, नारी, नर्क आदि शब्द बने हैं।
जलीयता लिप्सा कीचड़ भ्रम अज्ञान माया झूठ और अन्याय और पॉप के कीचड़ में फँसने या लिप्त होने के भावार्थ में नृ धातु प्रयुक्त होती है।

देव और मानव बनने के लिए प्रेम और न्याय का धर्म अपनाना पड़ता है।
नर्क में तो पुण्य से ऊपर का धर्म किसी को पसंद ही नहीं आता।
इसीलिए सब नर या नारी ही हैं अभी दुनिया में।

3•प्रश्न;
“कर्म उतना ही करो जितने का भार उठाकर अंत समय में चल सको”-ऐसा सन्तों का कथन है तो क्या सत्कर्मों के भी बोझ होते हैं?
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उत्तर;
केवल दानवसभ्यता में जो कर्म होते हैं उन्हीं के पाप का बोझ भारी होता है क्योंकि वे केवल दुष्कर्म करते हैं सत्कर्म नहीं।

दानवसभ्यता कर्मों से डरती है और कर्मफल से भी डरती है।
तमोगुण के कारण वे लोग कर्म करना ही नहीं चाहते।
और यदि कोई कर्म किया भी तो वह दुष्कर्म होता है, जिसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
अकर्मण्यता के कारण ही वे कम से कम कर्म करके अधिक से अधिक फल पाने की इच्छा करते हैं।
गेहूं उगाना और गेंहू चुराना।
गेंहू उगाने में 4 महीने लग सकते हैं लेकिन चुराने में 4 मिनट भी पर्याप्त है।
इसलिए आलसी अकर्मण्य तामसिक लोग चोरी को ही आदर्श मानते हैं।
लेकिन चोरी डकैती लूट तो दुष्कर्म है, अपराध है, पाप है।

दुष्कर्म बोझिल होता है।
पाप की गठरी भारी होती है।
ढोना सरल नहीं।

किन्तु सत्कर्म और सत्परिणाम का कोई भार नहीं होता।
बल्कि सत्कर्म तो मनुष्यों का उद्धारक होता है, उसमें बोझ कहाँ..?

मध्यकालीन या वर्तमान संतों महात्माओं के अधिकांश प्रवचन मूर्खतापूर्ण व अज्ञानमयी है।
पर्याप्त व्यक्तित्वविकास के विना प्रवचन समाज के लिए हानिकारक है।
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-(राम गुप्ता – स्वतंत्र पत्रकार – नोएडा)