आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला–
गत २४ अप्रैल को आयोजित उत्तरप्रदेश समीक्षा अधिकारी की परीक्षा करायी गयी थी। उसके ‘सामान्य हिन्दी एवं आलेखन’ के प्रश्नपत्र में एक नहीं, दो-चार नहीं, बल्कि न्यूनतम एक सौ पाँच अशुद्धियाँ होने का दावा और किसी ने नहीं, बल्कि समय-समय पर आयोजित करायी जानेवाली प्रतियोगितात्मक और सामान्य परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों मे की जा रही अशुद्धियों की ओर ध्यान आकृष्ट करनेवाले भाषाविज्ञानी और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने किया है।
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का सुस्पष्ट शब्दों मे कहना है कि जिस भी व्यक्ति ने प्रश्नपत्र बनाया है, उसे व्याकरण की समझ नहीं के बराबर है। उनका कहना है कि उस प्राश्निक को यही नहीं मालूम कि निर्देशात्मक क्रिया का रूप किस प्रकार का होता है। योजक और निर्देशात्मक चिह्न मे किस प्रकार का अन्तर होता है; उपविराम और निर्देशात्मक चिह्न का व्यवहार कहाँ होता है। समय और अधिकतम अंक के आगे निर्देशकचिह्न (–) लगता है, न कि योजकचिह्न (-)। आरम्भ मे ‘विशेष अनुदेश’ के नीचे अंकित होना चाहिए था– सभी प्रश्नो के उत्तर लिखने अनिवार्य हैं, जबकि लिखा हुआ है– सभी प्रश्न अनिवार्य हैं। ठीक उसके नीचे ‘प्रत्येक प्रश्न के निर्धारित अंक’ के स्थान पर ‘प्रत्येक प्रश्न के लिए निर्धारित अंक’ होगा। प्रश्न 1. मे ‘गद्य’ अलग भाग रहा है और ‘अवतरण’ अलग; योजकचिह्न निर्देशकचिह्न बनकर दोनो से अलग हो गया है, जबकि वहाँ ‘गद्य-अवतरण’ मुद्रित होना चाहिए था। पहले प्रश्न मे प्रश्नात्मक वाक्य ही ग़लत है। ‘ध्यान से’ के स्थान पर ‘ध्यानपूर्वक’ और ‘उत्तर दीजिए’ के स्थान पर ‘उत्तर लिखें’ होगा; क्योंकि परीक्षक निर्देश कर रहा होता है। निर्देश करते समय ‘लिखें’, ‘बतायें’, ‘प्रकाश डालें’, ‘समझायें’ आदिक क्रियाएँ हो जाती हैं। उसके अनन्तर निर्देशकचिह्न (–) का प्रयोग होता है। पहले गद्य-अवतरण का पहला वाक्यविन्यास ही अशुद्ध है। वहाँ लिखा है, “शिक्षा का अर्थ है जीना सीखने की कला।” इसका अर्थ है, इस प्रश्नपत्र को तैयार करनेवाले व्यक्ति को ‘शिक्षा’ का अर्थ ही नहीं मालूम; यह वाक्य अटपटा दिख रहा है। वहाँ होना चाहिए था, “शिक्षा का अर्थ है, किसी विद्यादिक के सीखने-सिखाने की क्रिया।” इसी पहले वाक्य मे ‘शिक्षा का मूल स्तोत्र’ लिखा है, जबकि ‘शिक्षा का मूल स्रोत’ होगा। ‘स्रोत’ का अर्थ ‘माध्यम’ है, जबकि ‘स्तोत्र’ का अर्थ ‘गुण और यश की स्तुति’ है, जिसका इस वाक्य के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। इसी अवतरण की तीसरी पंक्ति मे ‘विशेष महत्त्वपूर्ण है’ लिखा है, जबकि ‘बहुत महत्त्वपूर्ण है’ होगा या फिर ‘विशेष महत्त्व है’। ‘क्योंकि’ से पहले ‘अर्द्ध विरामचिह्न’ (;) का प्रयोग होगा। ‘मान्यताओं का स्खलन’ के स्थान पर ‘मान्यताओं का क्षरण/ह्रास’ हो रहा’ होगा। ‘कारण’ और ‘मानसिक’ के बीच मे ‘उनमे’ लगेगा। ‘यदि-तो’ के प्रयोग के समय ‘तो’ से पहले अल्प विरामचिह्न (,) नहीं लगता। ‘संस्कारों का निर्माण’ के स्थान पर ‘संस्कार-विकास/संवर्द्धन’ होगा; क्योंकि निर्माण कृत्रिम कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है; ‘संस्कार’ कृत्रिम नहीं होता। गद्य-अवतरण के अन्त मे (क) (ख) (ग) मे तीनो ‘गद्य — अवतरण’ के स्थान पर ‘गद्य-अवतरण’ होगा और तीनो प्रश्नो के अन्त मे ‘लिखिए’, ‘लिखिए’ तथा ‘कीजिए’ के स्थान पर क्रमश: ‘लिखें’, ‘लिखें’ तथा ‘करें’ होगा; क्योंकि यही शुद्ध निर्देशात्मक क्रियाशब्द हैं। प्रश्न 2. मे जिस सरकारी पत्र का प्रारूप दिया गया है, वह पूरी तरह से ग़लत है। पत्रांक और दिनांक के आगे कभी उपविरामचिह्न (:) नहीं लगेगा, बल्कि निर्देशकचिह्न (–) लगेगा। ‘प्रेषक’ और ‘सेवा मे’ मे कभी कोई चिह्न नहीं लगता। आप यदि ‘प्रेषक,’ और ‘सेवा मे,’ लिखते हैं तो वह ग़लत हो जायेगा; क्योंकि ‘प्रेषक’ और ‘सेवा मे’ के आगे कोई अन्य शब्द नहीं है। ‘शिक्षा विभाग’ और ‘उत्तरप्रदेश सरकार’ के बीच मे योजकचिह्न (-) लगेगा; क्योंकि दोनो के अर्थ क्रमश: ‘शिक्षा का विभाग’ और ‘उत्तरप्रदेश की सरकार’ है, जो कि षष्ठी तत्पुरुष समास का उदाहरण है। जैसे लखनऊ के आगे पूर्णविरामचिह्न लगा है वैसे ही ‘प्रयाग’ के आगे भी लगेगा। लखनऊ; दिनांक– २० जनवरी, २०२२ होगा, जिसे ग़लत लिखा गया है। ‘आयोग द्वारा’ के बीच मे योजकचिह्न अथवा ‘के’ का प्रयोग होगा। ‘गया’ से ‘गये’ बनता है, ‘गए’ नहीं। ‘भवदीय’ के आगे नीचे की ओर ‘भवदीय,’ लिखना ग़लत है; केवल ‘भवदीय’ होगा। इसी अनुपयुक्त पत्र मे ‘पृष्ठांकनसं०–‘ और ‘दिनांक–‘ होगा। ‘प्रतिलिपी सूचना’ के स्थान पर ‘प्रतिलिपि-सूचना’ होगा।
इसके नीचे भी अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ हैं। प्रश्न 3. के सभी निर्देशात्मक क्रियाशब्द अशुद्ध हैं। आश्चर्य है, प्राश्निक को ‘लिखिए’ लिखना नहीं आता, वह ‘लीखिए’ लिखता है। प्रश्न 4. मे निर्देशात्मक वाक्य का चरित्र न दिखकर, एक सामान्य-सा प्रश्न दिखता है। ‘अँग्रेजी शब्दों के हिन्दी-रूप लिखिए–‘ के स्थान पर’अँगरेज़ी-शब्दों के हिन्दी-रूप लिखें :–‘ होगा और पाँचवें विकल्प के आगे पूर्ण विरामचिह्न लगेगा, जो एक पूर्ण वाक्य का द्योतक होगा। इसी तरह से ‘हिन्दी-शब्दों के अँगरेज़ी-रूप लिखें :–‘ होगा। (ख) मे भी ‘प्रत्युत्तर’ के आगे पूर्ण विरामचिह्न लगेगा। (ग) मे ‘मुहावरों-लोकोक्तियों के अर्थ लिखते हुए, उनका वाक्यों मे प्रयोग करें :–‘ होगा। प्रश्न 5. मे ‘कम्पूटर-सम्बन्धी’ होगा। यहाँ भी निर्देशात्मक क्रियाशब्द का प्रयोग नहीं है। प्रश्न 10. हास्यास्पद है, जिसमे ‘अपनी विवाहिता स्त्री से उत्पन्न पुत्र’ का प्रयोग है। प्रश्न है, विवाहिता ‘स्त्री’ के स्थान पर कोई और होता है? ‘विवाहिता’ शब्द ही ‘स्त्री’ का बोधक है, अत: अलग से ‘स्त्री’ का लिखा जाना सर्वथा निराधार है। ‘अपनी पत्नी’ का प्रयोग उपयुक्त होगा। प्रश्न 14. मे ‘आँखों से ओझल’ के स्थान पर केवल ‘ओझल’ का प्रयोग होगा; ‘ओझल’ का अर्थ है, दिखायी न देना। आँखों से ही दिखता और नहीं दिखता है। प्रश्न 16 में एक अशुद्ध वाक्य पूछा गया है, जबकि इसमे दो-दो अशुद्ध वाक्य दिख रहे हैं :– पहला (a) और दूसरा (d); क्योंकि ‘पूज्यास्पद’ और ‘परीक्षा-प्रणाली’ अशुद्ध और अनुपयुक्त प्रयोग है। इनके स्थान पर क्रमश: ‘पूज्य’ और ‘परीक्षा-पद्धति’ होगी। ऐसे मे, ये उत्तर-विकल्प ही ग़लत हैं। प्रश्न 19. के सभी उत्तर-विकल्प ग़लत हैं। उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग यदि ‘जो बायें हाथ से सधा हुआ है’ का सही अर्थ ‘सव्यसाची’ मानेगा तो वह ग़लत माना जायेगा; क्योंकि ‘सव्यसाची’ का अर्थ है, ‘जो बायें और दायें हाथों से सभी कार्य समान रूप से कर सकने मे समर्थ हो।’ प्रश्न 20 और 22. के सभी उत्तर-विकल्प मे प्रयुक्त योजकचिह्न ग़लत हैं। प्रश्न 23. मे ‘मोक्ष पाने की इच्छा करनेवाला’ के लिए जितने भी उत्तर-विकल्प दिये गये हैं, वे ‘मोक्ष’ शब्द से इतर हैं, यद्यपि शब्दकोश मे ‘तितीर्षु’ को माना गया है। उपयुक्त शब्द ‘मुमुक्ष’ है; क्योंकि शब्दरचना के विचार से यह ‘मुच्’ (छोड़ना/मुक्त करना) धातु का शब्द है, जो उक्त संदर्भ मे सर्वाधिक प्रासंगिक है। ‘तितीर्षु’ मे ‘तैरने’ के अर्थ मे ‘तृ’ धातु का प्रयोग है, जो कहीं पर भी ‘मुक्ति’ की बात नहीं करता। प्रश्न 24. मे अशुद्ध वर्तनीवाला शब्द पूछा गया है, जबकि उत्तर-विकल्प मे दो अशुद्ध उत्तर-विकल्प :– ‘उँगली’ और ‘पांचवां’ दिख रहे हैं। शुद्ध शब्द तो ‘अंगुलिका’ से ‘अँगुली’ का सर्जन होता है, न कि ‘उँगली’ का, इसलिए उत्तर-विकल्प ग़लत हैं। प्रश्न 28. के सभी उत्तर-विकल्प ग़लत हैं; क्योंकि (a) और (c) ही सही उत्तर हैं। ‘श्रेष्ठ-सेठ’ और ‘कंकती-कंघी’ शुद्ध तत्सम-तद्भव शब्दयुग्म हैं।
इस प्रश्नपत्र मे उन प्रश्नो की बड़ी संख्या है, जिनमे विवरणचिह्न के स्थान पर निर्देशकचिह्न लगाये गये हैं और अन्तिम उत्तर-विकल्प के आगे पूर्ण विरामचिह्न नहीं लगाये गये हैं। इनके अतिरिक्त कई अन्य अशुद्धियाँ दिख रही हैं।
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का मानना है कि यह एक प्रकार से हमारी भाषा के साथ बलप्रयोग किया जा रहा है और उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग दशकों से ऐसे कुकृत्य करने के लिए जाना जाता रहा है, जिसमे कहीं कोई सुधार की स्थिति बनती दिख नहीं रही है। उन्होंने उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री और उच्चशिक्षामन्त्री से माग किया है कि वे सम्बन्धित आयोग के अधिकारियों के विरुद्ध कठोर काररवाई करायें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २५ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)